दोहरी जिम्मेदारी खत्म करने की मांग

सचिन पायलट प्रकरण के बाद कांग्रेस पार्टी में इस बात की भी मांग उठ रही है कि राज्यों में नेताओं को दोहरी जिम्मेदारी नहीं दी जाए और जिन नेताओं के पास दोहरी जिम्मेदारी उनसे एक जिम्मेदारी तत्काल वापस ली जाए। कांग्रेस मुख्यालय में कई नेता मान रहे हैं कि सचिन पायलट को जिस समय उप मुख्यमंत्री बनाया गया थी उसी समय राज्य में कोई नया प्रदेश अध्यक्ष बना दिया गया होता तो प्रदेश में इतना बड़ा संकट नहीं खड़ा होता। ऐसे ही मध्य प्रदेश में अगर कमलनाथ के मुख्यमंत्री बनने के बाद पार्टी ज्योतिरादित्य सिंधिया या उनके किसी करीब को प्रदेश अध्यक्ष बना देती तो वहां भी संकट टल सकता है। पहले कांग्रेस पार्टी ऐसे ही काम करती थी। हर प्रदेश के तीन बड़े नेताओं को मुख्यमंत्री या विधायक दल का नेता, प्रदेश अध्यक्ष और पार्टी का राष्ट्रीय पदाधिकारी बना कर एडजस्ट किया जाता था। ये तीनों अपनी अपनी राजनीति करते थे और पार्टी का केंद्रीय नेतृत उनकी पंचायत करता था।

जब से कांग्रेस पार्टी में सब कुछ एक ही व्यक्ति के हाथ सुपुर्द करने का चलन शुरू हुआ तब से पार्टी राज्यों में कमजोर होने लगी। अब भी राज्यों में सब कुछ एक ही नेता के सुपुर्द है। कई राज्यों में तो एक ही नेता दोहरी जिम्मेदारी निभा रहे हैं। महाराष्ट्र में सरकार बने एक साल होने जा रहे हैं पर वहां बाला साहेब थोराट की जगह नया अध्यक्ष नहीं बना है। वे कांग्रेस की ओर से राज्य सरकार में सबसे अहम मंत्री हैं और प्रदेश अध्यक्ष भी हैं। यहीं स्थिति झारखंड में है। वहां भी आठ महीने से सरकार है और रामेश्वर उरांव कांग्रेस की ओर से सबसे अहम मंत्री हैं और प्रदेश अध्यक्ष भी हैं। मध्य प्रदेश में कमलनाथ मुख्यमंत्री और प्रदेश अध्यक्ष दोनों रहे और अब भी वे प्रदेश अध्यक्ष हैं और विधायक दल के नेता भी हैं। पंजाब में अमरिंदर सिंह मुख्यमंत्री हैं और उनके करीबी सुनील जाखड़ को प्रदेश अध्यक्ष बनवाया गया है। कांग्रेस नेता चाहते हैं कि यह स्थिति बदले और हर राज्य में एक से ज्यादा शक्ति केंद्र बनें।

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