हरिवंश के कथित अपमान की राजनीति

यह अजीबोगरीब बात भाजपा के शीर्ष नेताओं और यहां तक कि प्रधानमंत्री तक की ओर से कही गई है। हर चीज का चुनावी इस्तेमाल करने वाले नेता, ऐसा लग रहा है कि अपनी कही बात के मतलब को ही नहीं समझ रहे हैं। सबसे पहले तो उनको समझना चाहिए कि राज्यसभा में अगर विपक्षी सांसदों के व्यवहार से किसी का अपमान हुआ है तो वह आसन का हुआ है किसी व्यक्ति का नहीं हुआ है। वह अपमान राज्यसभा के उप सभापति का अपमान है। वह व्यक्ति के रूप में हरिवंश नारायण सिंह का अपमान नहीं है। उच्च सदन के आसन को सिर्फ इसलिए एक व्यक्ति के रूप में बदला जा रहा है क्योंकि बिहार में चुनाव होना है और वे बिहार से राज्यसभा में चुन कर आए हैं। आसन के अपमान को एक व्यक्ति का अपमान बता कर खुद भाजपा और केंद्र सरकार आसन का आपमान कर रहे हैं।

अब दूसरी बात, हरिवंश नारायण सिंह का बिहार से क्या लेना-देना है? वे उत्तर प्रदेश के सिताब दियारा के रहने वाले हैं और बरसों से रांची में बसे हुए हैं, जो झारखंड की राजधानी है। बिहार से उनका संबंध तो तब बना, जब वे राज्यसभा की तलाश में अखबार लेकर बिहार पहुंचे थे। उन्होंने झारखंड और कई राज्यों से निकलने वाले प्रभात खबर अखबार का पटना संस्करण शुरू किया और यह सबको पता है कि अखबार का क्या रूझान रहा। अखबार के गुण-दोष पर विचार की जरूरत नहीं है। पर यह हकीकत है कि इससे ज्यादा बिहार से उनका जुड़ाव नहीं रहा है। राम जेठमलानी भी बिहार से राजद के सांसद रहे हैं और कपिल सिब्बल भी वहां से राज्यसभा सांसद रहे हैं। उसी तरह हरिवंश भी बिहार से सांसद हैं।

अव्वल तो निजी तौर पर उनका कोई अपमान नहीं हुआ है और आसन के अपमान की बात भी ऑब्जेक्टिव नहीं है क्योंकि विपक्षी पार्टियों का कहना है कि आसन ने संसदीय परंपराओं का अपमान किया। सोचें, आसन या व्यक्ति का अपमान बड़ा है दशकों से स्थापित संसदीय नियमों और परंपराओं का अपमान बड़ा है। असल में अगर बिहार में चुनाव नहीं होता तो मान-अपमान वाली यह राजनीति भी नहीं होती।

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