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मतदान के दिन रैलियों पर रोक हो

वैसे तो चुनाव से जुड़े अनेक नियम और आचार संहिता के अनेक मुद्दे हैं, जिनमें बदलाव की सख्त जरूरत है लेकिन मतदान के दिन बड़े नेताओं के रैली करने का मुद्दा ऐसा है, जिस पर तत्काल रोक लगनी चाहिए। मतदान के दिन होने वाली रैलियां, रोड शो और चुनाव प्रचार वोटिंग को तो प्रभावित करता ही है साथ स्वतंत्र व निष्पक्ष चुनाव की संभावना को भी कम करता है। इसके अलावा मतदान के दिन होने वाली रैलियों से हिंसा फैलने की संभावना अन्य दिनों के मुकाबले ज्यादा होती है।

पहले भी कई चरण में मतदान होते थे लेकिन मतदान को प्रभावित करने के लिए वोटिंग के दिन रैलियां करने का चलन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शुरू किया। जिस दिन मतदान होता है उस दिन वे अगले चरण के मतदान वाले किसी क्षेत्र में रैली करने पहुंच जाते हैं। जैसे शनिवार यानी 17 अप्रैल को पश्चिम बंगाल में पांचवें चरण का मतदान चल रहा था और उस दौरान प्रधानमंत्री मोदी ने दो चुनावी रैलियों को संबोधित किया। इससे पहले भी तीन चरण के मतदान के दिन उन्होंने रैली की और एक चरण के मतदान के दिन बांग्लादेश में भाषण आदि दिए। उसका भी एक मकसद मतदान को ही प्रभावित करना था।

जिस दिन ममता बनर्जी की नंदीग्राम सीट पर मतदान हो रहा था उस दिन प्रधानमंत्री ने चुनावी रैली की और कहा कि उन्होंने सुना है कि ममता दूसरी सीट से चुनाव लड़ने जा रही हैं। सोचें, प्रधानमंत्री की इस बात ने वोट डालने के लिए लाइन में खड़े लोगों पर कैसा असर डाला होगा! क्या इससे स्वतंत्र व निष्पक्ष चुनाव की संभावना कम नहीं होती है? इसी तरह मतदान के दिन रैलियों में प्रधानमंत्री, गृह मंत्री जैसे नेता अपने विरोधियों पर हिंसा फैलाने का आरोप लगाते हैं। इससे उनकी अपनी पार्टी के समर्थक भी उत्तेजित होते हैं और हिंसा की संभावना बढ़ जाती है। मतदान के दिन रैली करना कानूनी रूप से गलत नहीं है लेकिन नैतिक रूप से इसे सही नहीं कहा जा सकता है। इसलिए यह आयोग की जिम्मेदारी है कि वह इस तरह की रैलियों पर रोक लगाने का कानून बनाए।

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