मंदिर आंदोलन के सभी चेहरे हाशिए में

तो आखिरकार लालकृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी को अयोध्या में राम जन्मभूमि मंदिर निर्माण के लिए होने वाले भूमिपूजन और शिलान्यास का न्योता नहीं मिला। विश्व हिंदू परिषद के नेता और श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय ने खुद बताया है कि आडवाणी और जोशी से फोन करके पूछा गया था और उन्होंने आने में असमर्थता जाहिर की थी इसलिए न्योता नहीं भेजा गया। यह न्योता भेजने का नया कायदा है। अब तक यह होता था कि न्योता पहले भेजा जाता था और यह आमंत्रित सज्जन को तय करना होता था कि वे जाएंगे या नहीं। यहां उलटा हुआ। पहले ही आडवाणी और जोशी की उम्र और कोरोना के संकट आदि का हवाला देकर मीडिया में माहौल बनाया गया और फिर न्योता नहीं भेजा गया।

उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह को भी न्योता नहीं मिला है। उनके मामले में भी वहीं रास्ता अख्तियार किया गया, जो आडवाणी और जोशी के मामले में किया गया। उमा भारती को न्योता मिला है और वे अयोध्या जाएंगी भी लेकिन शिलान्यास कार्यक्रम में हिस्सा नहीं लेंगी। जिस समय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भूमिपूजन और शिलान्यास करेंगे उस समय वे सरयू के किनारे होंगी। उन्होंने कहा है कि वे सरयू के किनारे रहेंगी और प्रधानमंत्री के चले जाने के बाद रामलला के दर्शन के लिए जाएंगी। उनका कहना है कि वे कोरोना की वजह से प्रधानमंत्री की सेहत को लेकर चिंतित हैं और इसी वजह से कार्यक्रम में नहीं जा रही हैं। बजरंग दल के संस्थापक विनय कटियार ने भी सिर्फ इतना कहा है कि वे पांच अगस्त को रामलला के दर्शन के लिए जाएंगे। इस पूरे कार्यक्रम में उनकी भी कोई भूमिका नहीं है।

सोचें, आडवाणी, जोशी, कल्याण सिंह, उमा भारती और विनय कटियार ये पांच वे चेहरे हैं, जिन्हें देश के लोग राममंदिर आंदोलन के साथ जोड़ते हैं। छठा नाम अशोक सिंघल का है पर अब वे दिवंगत हो चुके हैं। जब राममंदिर बनने की बारी आई है तो ये सभी छह चेहरे शिलान्यास और भूमिपूजन से अलग रहेंगे। मंच पर सिर्फ पांच लोग होंगे- प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत, श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के अध्यक्ष महंत नृत्यगोपाल दास, उत्तर प्रदेश की राज्यपाल आनंदी बेन पटेल और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ। इनमें से महंत नृत्यगोपाल दास ही अकेले हैं, जो उस समय सक्रिय रूप से मंदिर आंदोलन से जुड़े हुए थे। भाजपा के सांसद सुब्रह्मण्यम स्वामी ने प्रधानमंत्री का नाम लेकर कहा है कि मंदिर निर्माण की लड़ाई में उनकी कोई भूमिका नहीं है। स्वामी के ऐसा कहने के अपने कारण हैं पर जो चीजें स्पष्ट दिख रही हैं वो ये हैं कि जो लोग आंदोलन से जुड़े रहे और आज तक मुकदमे झेल रहे हैं वे इस पूरे मामले में हाशिए में डाल दिए गए हैं।

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