कर्ज माफ नहीं हुआ तो वसूली कितनी हुई?

भारतीय रिजर्व बैंक, आरबीआई ने 50 विलफुल डिफॉल्टर्स का कोई 68 हजार करोड़ रुपए का कर्ज बट्टेखाते मंव डाला। इस पर कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी सहित कई नेताओं ने कहा कि सरकार ने कर्ज माफ कर दिया। पहले भी जब कर्ज बट्टेखाते में डाला जाता था तो विपक्ष उसे माफ करना बताता था। तभी वित्त मंत्री रहते दिवंगत अरुण जेटली ने बहुत विस्तार से ससंद में राइट ऑफ करने और वेब ऑफ करने का फर्क समझाया था। वहीं फर्क उनकी उत्तराधिकारी निर्मला सीतारमण ने भी समझाया। अच्छी बात है, लोग यह समझ गए कि सरकार ने कर्ज माफ नहीं किया है बट्टेखाते में डाला है और जैसा निर्मला सीतारमण ने कहा कि यूपीए की सरकार ने भी एक लाख 60 हजार करोड़ रुपए का कर्ज बट्टेखाते में डाला था।

इसके बाद सवाल उठता है कि जो कर्ज राइट ऑफ किया जाता है यानी बट्टेखाते में डाला जाता है उनकी वसूली का क्या प्रयास होता है? पूर्व वित्त मंत्री पी चिदंबरम ने कहा है कि मौजूदा सरकार ने पिछले छह साल में छह लाख 60 हजार करोड़ रुपए का कर्ज बट्टेखाते में डाला है। यानी राइट ऑफ किया है। अब सरकार को बताना चाहिए कि बट्टेखाते में डाले गए इस कर्ज की वसूली का क्या प्रयास हुआ और कितने की वसूली हो पाई। अगर वसूली का प्रयास नहीं हुआ या कोई वसूली नहीं हुई तो इससे क्या फर्क पड़ता है कि बट्टेखाते में डाला है या माफ कर दिया है? बात तो एक ही हुई।

One thought on “कर्ज माफ नहीं हुआ तो वसूली कितनी हुई?

  1. जी हां, देश का हर व्यक्ति इस बट्टे खाते और माफ करने के चक्रव्यूह को तोड़ना चाहता है और जानना चाहता है कि बट्टे खाते में डाले गए पैसे की बसूली की वास्तविकता क्या है? क्या बट्टा खाता बड़े लोगों को कर्ज माफ कराने का एक सीढ़ी के रूप में प्रयोग होने वाला वाक्य मात्र है ताकि कुछ सालों बाद हजारों करोड़ों लेने वालों को भुला दिया जाए? आम व्यक्ति जीवन भर कड़ी मेहनत से बच्चों को पालन पोषण में खर्च कर देता है और मकान या दुकान के लिए लिए छोटे से कर्ज के नीचे अपने जीवन की हर खुशी खत्म कर देता है वो मुस्कुरा भी नहीं सकता, और अगर देरी करता है तो उसे और उसके परिवार को जो सजा भुगतनी पड़ती है वो हर कोई जानता है, आम व्यक्ति का लिया कर्ज न चुकाने के एवज में पीढ़ियों को उसका कष्ट भुगतना पड़ता है लेकिन ये बड़े चोर और लुटेरे मजे करते हैं जिसने कर्ज लिया उसके मरने के बाद उसकी सम्पति का उपभोग करते हैं जिन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता और समाज बड़े अदब से ऐसे लोगों के आगे नतमस्तक होता है।

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