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दिल्ली की स्वास्थ्य सेवा की हकीकत!

दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने दो चीजों में सबसे ज्यादा निवेश किया या निवेश करने का दावा किया। उनके मुताबिक उनकी सरकार पिछले कई बरसों से अपने बजट का एक-तिहाई से ज्यादा हिस्सा स्वास्थ्य और शिक्षा पर खर्च कर रही है। और आज स्थिति यह है कि कोरोना वायरस के 20 हजार मरीजों में दिल्ली की स्वास्थ्य सेवा की कमर टूटी हुई दिख रही है। वह भी तब है, जब दिल्ली सरकार के अस्पतालों से ज्यादा मरीज केंद्र सरकार के अस्पतालों में भरती हैं।

इसके बावजूद स्थिति यह है कि केजरीवाल ने दिल्ली की सीमा सील कर दी। उनकी पार्टी कह रही है कि सीमा खुली रही तो दूसरे राज्यों से लोग आकर दिल्ली के अस्पतालों में भरती हो जाएंगे, फिर दिल्ली के लोगों का क्या होगा? सोचें, उत्तर प्रदेश इसलिए सीमा सील किया कि नोएडा में हुए कोरोना संक्रमण में 42 फीसदी हिस्सी दिल्ली से जाने वाले लोगों का है। उन्हें इस बात की चिंता नहीं है कि दिल्ली के लोग उत्तर प्रदेश या हरियाणा में इलाज कराएंगे। जबकि हकीकत है कि दिल्ली के काफी संख्या में लोग नोएडा, गाजियाबाद या गुड़गांव के बड़े अस्पतालों में जाकर भरती हैं।

एक आंकड़े के मुताबिक दिल्ली के करीब 12 हजार एक्टिव केसेज में से सिर्फ 42 मरीजों को वेंटिलेटर की जरूरत है और इनमें से सिर्फ एक मरीज दिल्ली सरकार के अस्पताल में भरती है। केंद्र सरकार के अस्पतालों में 19 मरीज भरती हैं और 22 मरीज लाखों रुपए खर्च करके निजी अस्पतालों में इलाज करा रहे हैं। इसके बावजूद दिल्ली सरकार की हालत खराब है। ऊपर से मरीजों की संख्या से लेकर मरने वालों की संख्या छिपाने के आरोप अलग लग रहे हैं। तभी पिछले कुछ दिन से दिल्ली सरकार पुरानी मौतों के आंकड़े धीरे-धीरे जारी करके अपनी सूची अपडेट कर रही है।

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