कृषि कानूनों पर बिहार में जनमत संग्रह!

भारत सरकार ने मनमाने तरीके से कृषि से जुड़े कानूनों को बदलने वाले तीन विधेयक संसद से पास कराएं हैं। सरकार ने मजदूरों से जुड़े कानूनों में भी बड़ा बदलाव कर दिया है और वह विपक्ष की गैरहाजिरी में। कृषि से जुड़े कानूनों पर तो संसद में चर्चा भी हुई थी पर श्रम कानून तो एकतरफ, सिर्फ सत्तापक्ष के सांसदों के भाषणों के बाद ही पास हो गया। किसान और मजदूर से जुड़े इन बड़े बदलावों के बाद पहला चुनाव बिहार में होना है। अगले महीने बिहार में विधानसभा के चुनाव शुरू होंगे। सो, माना जा रहा है कि बिहार का चुनाव इन कानूनों पर जनमत संग्रह की तरह हैं।

क्या इसी वजह से सरकार ने इन विधेयकों को आनन-फानन में पास कराया है? ध्यान रहे किसान और मजदूर से जुड़े कानून कम से कम राज्यसभा में जिस तरह से पास कराए गए हैं उसे देख कर लग रहा है कि दुनिया खत्म होने वाली थी और उससे पहले सरकार का एकमात्र एजेंडा इन विधेयकों को कानून बनाने था। विपक्ष इसे संसद की स्थायी या सेलेक्ट कमेटी में भेजने की मांग कर रहा था। ऐसा होता तो ये विधेयक टल जाते और शीतकालीन या अगले साल के बजट सत्र में इसे पास कराना होता।

अगले साल पांच राज्यों के चुनाव हैं। इन पांचों में से कहीं भी भाजपा बहुत भरोसे में नहीं है। असम में उसकी सरकार है पर नागरिकता कानून की वजह से राज्य में भाजपा का बहुत विरोध है। अगर उन चुनावों से पहले कृषि और मजदूर कानूनों में मनमाना बदलाव किया जाता और उसके बाद चुनाव के नतीजे भाजपा के अनुकूल नहीं आते तो विपक्ष इन मुद्दों को लेकर और दबाव बनाता। तभी ऐसा लग रहा है कि कई और कारणों के साथ यह कारण भी हो सकता है कि बिहार चुनाव से पहले इन विधेयकों को पास करा देते हैं क्योंकि भाजपा को बिहार में अच्छे नतीजे का पूरा भरोसा है।

बिहार में अगर भाजपा और जदयू का गठबंधन जीतता है तो उसके दूसरे कारण होंगे लेकिन जैसे उत्तर प्रदेश में विधानसभा का चुनाव जीतने के बाद भाजपा ने कहा कि नोटबंदी के कारण जीते हैं और यूपी के लोगों ने नोटबंदी पर मुहर लगाई है वैसे ही बिहार की जीत को कृषि और श्रम कानूनों की जीत प्रचारित किया जा सकता है। असल में बिहार में पहले से ही मंडी कानून नहीं है। नीतीश कुमार ने 2006 में ही उसे खत्म कर दिया था। इसलिए वहां के किसान पहले से ही अपनी फसल खुले बाजार में बेच रहे हैं। इसलिए उनको कृषि से संबंधित कानून से ज्यादा फर्क नहीं पड़ता है। जहां तक श्रम कानूनों का मामला है तो उससे भी बिहार का कोई लेना-देना नहीं है क्योंकि बिहार में फैक्टरियों की संख्या गिनी-चुनी है। वहां अगर मजदूरों को काम मिल रहा होता तो वे देश भर में घूम घूम कर नौकरी के लिए नाक क्यों रगड़ रहे होते!

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