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ओबीसी वोट की चिंता में प्रादेशिक नेता

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Regional leaders obc vote प्रादेशिक पार्टियां इन दिनों बहुत चिंता में दिख रही हैं। बिहार, उत्तर प्रदेश से लेकर देश के लगभग हर राज्य के प्रादेशिक क्षत्रप इस समय दो काम करते दिख रहे हैं। उनका पहला काम भारतीय जनता पार्टी के मुकाबले एक मजबूत गठबंधन बनाने का प्रयास। इसके लिए सब भागदौड़ कर रहे हैं। दूसरा काम जाति आधारित जनगणना की मांग है, जिसे लेकर प्रादेशिक क्षत्रप बहुत मुखर हैं। इतने मुखर हैं कि बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार अपने धुर विरोधी राष्ट्रीय जनता दल के नेता और बिहार विधानसभा में नेता विपक्ष तेजस्वी यादव को साथ लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मिलने दिल्ली पहुंच गए।

नीतीश कुमार और तेजस्वी यादव दोनों ने प्रधानमंत्री से जाति आधारित जनगणना कराने की मांग की है। राजद प्रमुख लालू प्रसाद ऐलान कर चुके हैं कि अगर इस बार जातियों की गिनती नहीं होती है तो जनगणना का बहिष्कार किया जाएगा। समाजवादी पार्टी भी इसकी मांग कर चुकी है। हालांकि उसने जनगणना के बहिष्कार का ऐलान नहीं किया है। सवाल है कि जाति आधारित जनगणना कराने और भाजपा के विरोध में मजबूत विपक्षी गठबंधन बनाने की इतनी चिंता प्रादेशिक पार्टियों को क्यों है?

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इसका कारण सीएसडीएस और लोकनीति द्वारा चुनावी आंकड़ों के विश्लेषण और सर्वेक्षण से समझ में आया है। इस अध्ययन का लब्बोलुआब यह है कि भाजपा ने प्रादेशिक पार्टियों के ओबीसी वोट बैंक में जबरदस्त सेंध लगाई है। नरेंद्र मोदी की कमान में भाजपा की पहली जीत यानी 2014 में ऐसा नहीं हुआ था। 2004 से 2014 के तीन चुनावों में प्रादेशिक पार्टियों का ओबीसी वोट शेयर 37 फीसदी के आसपास था। लेकिन 2019 के लोकसभा चुनाव में देश के 44 फीसदी ओबीसी मतदाताओं ने भाजपा को वोट दिया और प्रादेशिक पार्टियों की हिस्सेदारी सिमट कर 27 फीसदी पर आ गई। कांग्रेस को 15 फीसदी ओबीसी वोट मिले।

सोचें, लगभग आधे ओबीसी मतदाताओं ने लोकसभा चुनाव में भाजपा को वोट दिया। इस आंकड़े ने प्रादेशिक पार्टियों की चिंता बढ़ाई है। हालांकि विधानसभा चुनाव में भाजपा के मुकाबले प्रादेशिक पार्टियों के पक्ष में ज्यादा ओबीसी वोट जाता है। जैसे बिहार में 2019 के लोकसभा चुनाव में राजद को सिर्फ 11 फीसदी ओबीसी वोट मिले, लेकिन 2020 के विधानसभा चुनाव में यह आंकड़ा 29 फीसदी पहुंच गया। तभी प्रादेशिक पार्टियों को लग रहा है कि जाति जनगणना की मांग करा कर ओबीसी मतदाताओं को भाजपा से दूर किया जा सकता है और दूसरा तरीका यह है कि मजबूत विपक्षी गठबंधन बना कर यह मैसेज दिया जाए कि प्रादेशिक क्षत्रप भाजपा को हराने वाले हैं। इन्हीं दो कारणों से इन दिनों सभी प्रदेशों की क्षेत्रीय पार्टियों के नेता भाजपा के विरोध में ओवरटाइम कर रहे हैं।

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