अजब रेम्डेसिवीर की गजब कहानी!

भारत में कोरोना वायरस से गंभीर रूप से बीमार लोगों के इलाज में अब रेम्डेसिवीर दवा का इस्तेमाल होगा। भारत की ड्रग रेगुलेटरी ऑथोरिटी से इस दवा को भारत में बेचने की इजाजत दी है। यह एक ऐसी दवा है, जिसके बारे में कहा जाता है कि यह दवा अभी तक अपने लिए बीमारी तलाश रही है। आमतौर पर बीमारी के लिए दवा तलाशी जाती है पर यह ऐसी दवा है, जिसके लिए बीमारी तलाशी जा रही है। इसे अमेरिकी कंपनी गिलियड साइंस ने 2009 में असल में हेपेटाइटिस-सी और सांस की बीमारी की दवा के तौर पर बनाया था। पर थोड़े समय के बाद इसका इस्तेमाल इबोला वायरस के बीमारों को ठीक करने के लिए किया गया। उसके बाद सार्स और मर्स से संक्रमित मरीजों पर भी इसका इस्तेमाल हुआ और अब कोविड-19 के मरीजों पर इसका इस्तेमाल होगा।

बहरहाल, इस दवा का खेल इतना ही नहीं है कि दुनिया भर के हेल्थ विशेषज्ञ इसके लिए बीमारी तलाश रहे हैं। भारत में इसका खेल और गहरा है। भारत में फरवरी में ही इस दवा के पेटेंट को मंजूरी दी गई है। यानी यह एक विशिष्ट दवा है और उसी के तौर पर सन 2035 तक बेची जाएगी। ऐसे ही पेटेंट के तहत कंपनी बांग्लादेश में इसे बनाने वाली कंपनी ने एक डोज की कीमत पांच हजार रुपए तय की है। गंभीर रूप से बीमार कोविड-19 के मरीज को इसकी छह डोज देनी पड़ सकती है। यानी सिर्फ दवा के ऊपर 30 हजार रुपए का खर्च है। अभी इस दवा को बिक्री की मंजूरी देते हुए भारतीय नियामक ने यह भी कहा है कि कंपनी ही इसकी कीमत तय करेगी। दुनिया भर में इसकी बिक्री से कई बड़े लोगों को फायदा होने वाला है, जिनमें कुछ बड़े परोपकारी लोग भी शामिल हैं, जिनकी लॉबिंग से गरीब देशों में इस दवा को पेटेंट और बिक्री की फटाफट अनुमति मिल रही है।

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