रूस का जनमत संग्रह एक सबक है

रूस में राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने जनमत संग्रह कराया, जिसके जरिए उन्होंने सन 2036 तक अपनी कुर्सी सुरक्षित कराई है। हालांकि संविधान बदलने के लिए कराई गई इस वोटिंग को उनकी सरकार न जनमत संग्रह नहीं कहा पर चूंकि लोगों को हां या नहीं में ही जवाब देना था इसलिए यह एक तरह का जनमत संग्रह ही था। बहरहाल, रूस में हुआ जनमत संग्रह भारत सहित कई देशों के उन तमाम नेताओं के लिए एक सबक है, जो ऑनलाइन वोटिंग की बात करते रहते हैं। बिहार के उप मुख्यमंत्री सुशील मोदी ने भी कोरोना की वजह से ऑनलाइन वोटिंग पर विचार करने की बात कही थी। हकीकत यह है कि रूस जैसे विकसित देश में भी ऑनलाइन वोटिंग बहुत सफल नहीं हुई।

कोरोना वायरस की वजह से रूस में बैलेट पेपर के साथ साथ लोगों को ऑनलाइन वोटिंग की भी इजाजत दी गई थी। यह वोटिंग पूरे सात दिन तक चलती रही। इसके बावजूद महज 64 फीसदी लोगों ने मतदान में हिस्सा लिया। सो, जो लोग यह मानते हैं कि ऑनलाइन वोटिंग से मत प्रतिशत बढ़ेगा उन्हें इस आंकड़े को देखना चाहिए। ध्यान रहे रूस में ज्यादातर लोग स्मार्ट फोन या लैपटॉप-कंप्यूटर वाले हैं। इंटरनेट की पहुंच भी भारत से बेहतर है। फिर भी 64 फीसदी लोग ही वोट दे पाए। दूसरे, ऑनलाइन वोटिंग में बड़े पैमाने पर गड़बड़ी के आरोप लगे। विपक्षी पार्टियां इस नतीजे को खारिज कर रही हैं।

इसी तरह का दूसरा सबक अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का भी है। ट्रंप ने ऑनलाइन वोटिंग की संभावना से पूरी तरह से इनकार किया है। उनका कहना है कि तकनीकी कंपनियां और कुछ सरकारी लोग भी ऑनलाइन वोटिंग में गड़बड़ी करके डेमोक्रेटिक पार्टी को जिताने का प्रयास कर सकते हैं। जाहिर है कि अमेरिका, रूस जैसे विकसित देशों में भी इसका विरोध है और वोटिंग में गड़बड़ी का अंदेशा है तो भारत जैसे देश को इससे दूर ही रहना चाहिए।

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