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आदित्य ठाकरे ने मौका नहीं गंवाया

ऐसा मानने वाले बहुत लोग हैं, जो कहते हैं कि राहुल गांधी ने 2009 में एक बड़ा मौका गंवाया था। 2009 में कांग्रेस की जीत के बाद उनको प्रधानमंत्री बन जाना चाहिए था। घटना हो जाने के बाद उसकी व्याख्या करने वाले राजनीतिक जानकारों का यह भी कहना था कि 2009 में राहुल प्रधानमंत्री नहीं तो कम से कम मंत्री बन जाते। अगर वे उस समय मंत्री बन गए होते तो फिर 2011-12 में जब देश भर में आंदोलन चला उस समय वे प्रधानमंत्री बन सकते थे। इन तमाम व्याख्याओं का लब्बोलुआब यह है कि राहुल गांधी ने एक बड़ा मौका गंवाया, जिसकी वजह से विपक्ष को उनकी छवि कमजोर और नासमझ नेता की बनाने में मदद मिल रही है।

यह गलती आदित्य ठाकरे ने नहीं की। उन्होंने निश्चित रूप से राहुल गांधी के घटनाक्रम से सबक लिया है। ध्यान रहे महाराष्ट्र चुनाव से ठीक पहले हिंदी की एक मशहूर चैनल की लोकप्रिय एंकर ने आदित्य ठाकरे को शिव सेना का राहुल गांधी कहा था। हालांकि बाद में उन्होंने इसके लिए माफी मांगी थी। पर यह बात उद्धव और आदित्य ठाकरे के दिमाग में बैठ गई और उन्होंने तय किया कि चाहे कुछ भी हो जाए विपक्ष को मौका नहीं देना है कि वह आदित्य ठाकरे की छवि राहुल गांधी वाली बनाए, उनको भी पप्पू कहना शुरू करे। सो, आदित्य ठाकरे अपने पिता उद्धव ठाकरे की सरकार में मंत्री बन गए हैं। महाराष्ट्र में ऐसा पहली बार हुआ है कि पिता-पुत्र इस तरह से एक साथ सरकार में हों। अब जब तक सरकार बनेगी आदित्य को मजबूत और समझदार नेता के तौर पर उनकी ब्रांडिंग होती रहेगी।

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