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उपचुनाव भी क्या मोदी-शाह लड़वाएं?

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भारतीय जनता पार्टी का उपचुनाव जीतने का रिकार्ड बहुत खराब है। पार्टी आमतौर पर उपचुनावों में हार जाती है, जिसे लेकर सोशल मीडिया में खूब मजाक भी बनते हैं। अभी चार राज्यों में विधानसभा की चार और लोकसभा की एक सीट पर उपचुनाव हुआ था, जिसमें सभी सीटों पर भाजपा हार गई। कुछ दिन पहले हिमाचल प्रदेश की चार विधानसभा और एक लोकसभा सीट पर उपचुनाव हुआ था तो भाजपा वहां भी सभी सीटों पर हारी। पिछले विधानसभा चुनाव यानी 2019 के बाद से झारखंड में तीन सीटों पर उपचुनाव हुए और भाजपा तीनों पर हारी। सोचें, भाजपा चुनाव जीत जाती है लेकिन उपचुनाव नहीं जीत पाती है। इसका क्या कारण है?

क्या इसका कारण यह है कि उपचुनाव में नरेंद्र मोदी और अमित शाह प्रचार नहीं करते हैं? आमतौर पर राष्ट्रीय पार्टियों का शीर्ष नेतृत्व उपचुनावों में प्रचार नहीं करता है। वैसे हर चुनाव नरेंद्र मोदी के चेहरे पर और अमित शाह की रणनीति से लड़ा जाता है। लेकिन उपचुनाव में ये दोनों रणनीति बनाने या प्रचार करने से दूर रहते हैं। अगर इस वजह से भाजपा हार रही है तो यह उसके लिए बड़ी चिंता की बात होनी चाहिए। इसका मतलब यह होगा कि मोदी और शाह के अलावा भाजपा के पास कोई दूसरी पूंजी नहीं है। इसका यह भी मतलब है कि भाजपा के प्रदेशों के नेता या दूसरे केंद्रीय नेताओं का कोई मतलब नहीं है। सोचें, भाजपा ने पश्चिम बंगाल की आसनसोल लोकसभा सीट पर 30 से ज्यादा नेताओं को प्रचार के लिए भेजा था लेकिन वह तीन लाख से ज्यादा वोट से हारी। तभी भाजपा के नेता भी मजाक भी कह रहे हैं कि अब उपचुनाव भी मोदी और शाह को लड़वाना होगा।

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