Sonia Gandhi virtual meeting सोनिया की वर्चुअल मीटिंग, नतीजा क्या?
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सोनिया की वर्चुअल मीटिंग, नतीजा क्या?

Congress party political crisis

जैसे जैसे 30 सितंबर की तारीख नजदीक आ रहा है यह साबित हो रहा है कि कांग्रेस की अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गांधी ने संसद का मॉनसून सत्र खत्म होने के बाद पिछले महीने 20 अगस्त को देश की विपक्षी पार्टियों के 19 नेताओं के साथ जो वर्चुअल बैठक की थी वह एक दिखावा भर थी। बैठक के जरिए कांग्रेस को यह मैसेज देना था कि वह विपक्षी गठबंधन का नेतृत्व कर रही है। दूसरी ओर विपक्षी पार्टियों को भी यह दिखाना था कि वे भाजपा के खिलाफ लड़ाई को लेकर गंभीर हैं और कांग्रेस का नेतृत्व स्वीकार कर रहे हैं। लेकिन असल में न तो कांग्रेस को नेतृत्व करना था और न विपक्षी पार्टियों को कांग्रेस के नेतृत्व में काम करना था। Sonia Gandhi virtual meeting

तभी उस मीटिंग में तय हुए किसी कार्यक्रम पर अमल नहीं हुआ है। उस वर्चुअल बैठक में तय हुआ था कि 20 से 30 सितंबर के बीच देश भर में सारी विपक्षी पार्टियां मिल कर साझा आंदोलन करेंगी। इस फैसले के एक महीने से ज्यादा बीत जाने के बाद 27 सितंबर तक तो कोई आंदोलन नहीं हुआ है। विपक्ष की डेढ़ दर्जन पार्टियों की तो छोड़िए, कांग्रेस ने खुद भी कोई आंदोलन नहीं किया है। सारी पार्टियां अपनी अपनी राजनीति कर रही हैं और कांग्रेस खुद का आंतरिक विवाद सुलझाने में लगी है।

opposition parties

इस बीच कांग्रेस ने आंदोलन के लिए अपनी एक कमेटी बना दी, जिसका अध्यक्ष दिग्विजय सिंह को बनाया। कांग्रेस अध्यक्ष ने जब दिग्विजय सिंह को सतत आंदोलन के लिए चुना तो लगा था कि वे शायद विपक्षी पार्टियों से तालमेल करेंगे और साझा आंदोलन होगा। लेकिन ऐसा भी नहीं हुआ है। कांग्रेस अध्यक्ष की मीटिंग में तय हुआ था कि केंद्रीय कृषि कानूनों, किसान आंदोलन, महंगाई, पेट्रोल-डीजल की बढ़ती कीमतों के विरोध और कश्मीर में चुनाव कराने व उसका राज्य का दर्जा बहाल करने जैसे 11 मुद्दों पर देश भर में आंदोलन होगा। इस मीटिंग में तृणमूल कांग्रेस की ममता बनर्जी, डीएमके नेता एमके स्टालिन, एनसीपी के शरद पवार भी शामिल थे। इनमें से किसी ने अपनी पार्टी की ओर से भी पहल नहीं की और न कांग्रेस की ओर से किसी ने इन नेताओं से संपर्क किया।

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आंदोलन की तैयारी करने की बजाय कांग्रेस पार्टी अपने आंतरिक विवाद सुलझाने में लग गई। पंजाब का मामला 15 दिन से चल रहा है। उससे पहले कई दिन तक छत्तीसगढ़ का मामला चलता रहा और पार्टी के विधायक व नेता दिल्ली में डेरा डाले रहे। अब कहा जा रहा है कि राजस्थान का मसला सुलझाना है। इस बीच प्रियंका गांधी हिमाचल प्रदेश छुट्टी मनाने भी चली गईं। उधर पश्चिम बंगाल में उपचुनावों की घोषणा हो गई तो ममता बनर्जी भबानीपुर सीट से चुनाव मैदान में उतर गईं। उनकी पूरी पार्टी उनके लिए चुनाव लड़ने में लगी है। महाराष्ट्र में सरकार चला रही भाजपा की दो सहयोगी पार्टियां शिव सेना और एनसीपी की आपस में लड़ाई शुरू हो गई। इन सबके बीच साझा आंदोलन का एजेंडा ठंडे बस्ते में चला गया। अब यह देखना दिलचस्प है कि कांग्रेस की आंदोलन कमेटी क्या करती है और उसकी ओर से शुरू होने वाले किसी आंदोलन में बाकी विपक्षी पार्टियों की क्या भूमिका बनती है।

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