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मोदी के चेहरे पर राज्य जीतती है भाजपा!

राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली का चुनाव कई मायनों में देश की राजनीति को प्रभावित करने वाला साबित होगा। वैसे भी दिल्ली की राजनीति का असर पूरे देश में होता है पर इस बार दिल्ली का चुनाव खास इसलिए है क्योंकि पहली बार भाजपा बिना मुख्यमंत्री प्रोजेक्ट किए चुनाव लड़ने जा रही है। भाजपा इस बार दिल्ली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के चेहरे पर विधानसभा का चुनाव लड़ेगी। इससे पहले भाजपा ने किरण बेदी, डॉक्टर हर्षवर्धन, विजय कुमार मल्होत्रा, सुषमा स्वराज, मदन लाल खुराना आदि नेताओं के चेहरे पर चुनाव लड़ा है।

भाजपा के लिए चुनौती वाली बात यह है कि 1993 के दिल्ली विधानसभा के पहले चुनाव के बाद से भाजपा लगातार हार रही है। बीच में सिर्फ एक चुनाव में दिसंबर 2013 में भाजपा 32 सीट जीत कर सबसे बड़ी पार्टी बनी थी पर वह सरकार नहीं बना पाई थी और उसके बाद वाले चुनाव में वह तीन सीटों पर सिमट गई। मुख्यमंत्री का चेहरा प्रोजेक्ट कर लगातार चुनाव हार रही भाजपा ने इस बार प्रधानमंत्री के चेहरे पर दांव लगाया है। ध्यान रहे छह सात महीने पहले लोकसभा चुनाव में दिल्ली में भाजपा सभी सीटों पर जीती और राज्य की 70 में 65 विधानसभा सीटों पर उसे बढ़त मिली थी। वह चमत्कारिक नतीजा मोदी की वजह से आया था। भाजपा वहीं जादू दोहराना चाहती है।

ध्यान रहे भाजपा राज्यों में जब भी मोदी के चेहरे पर लड़ी है तब चुनाव जीती है और मोदी-अमित शाह की कमान में भी भाजपा जब अपने क्षत्रपों के चेहरे पर लड़ी है तो चुनाव हारी है। भाजपा ने 2014 में महाराष्ट्र, हरियाणा, जम्मू कश्मीर और झारखंड का चुनाव मोदी के चेहरे पर लड़ा था औऱ चुनाव जीती थी। इस बार मुख्यमंत्रियों के चेहरे पर लड़ा तो हार गई। ऐसे ही 2017 में भाजपा ने उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश में मोदी के चेहरे पर लड़ा तो पार्टी चुनाव जीती थी।

तभी दिल्ली में इस बार भाजपा ने मोदी का ब्रह्मास्त्र चला है। लोकसभा चुनाव के बाद से भाजपा के नतीजे लगातार खराब हो रहे हैं उसे इसे रोकना है। क्योंकि अगर यह जारी रहा तो बिहार और अगले साल होने वाले पांच राज्यों के चुनाव से पहले विपक्ष को बड़ी ताकत मिलेगी और भाजपा कार्यकर्ताओं को मनोबल गिरेगा। इसका नुकसान यह है कि इसके बावजूद अगर दिल्ली में आम आदमी पार्टी जीत जाती है तो मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के प्रधानमंत्री मोदी से ज्यादा लोकप्रिय होने का मैसेज जाएगा। यह भी मैसेज होगा कि केजरीवाल ही उनके विकल्प हैं और उन्हें रोक सकते हैं। तब बंगाल चुनाव तक केजरीवाल के नाम का नैरेटिव बना रहेगा और इसका सबसे ज्यादा असर बिहार के चुनाव में होगा।

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