Andhra Pradesh Legislative Council आंध्र प्रदेश विधान परिषद की कहानी
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आंध्र प्रदेश विधान परिषद की कहानी

jagan mohan reddy

नेता अवसरवादी होते हैं। सरकारें भी अवसरवादी होती हैं। लेकिन नेता, पार्टियां और सरकारें लोगों की नजर बचा कर ही अवसरवादिता वाले काम करती हैं। आंध्र प्रदेश की जगन मोहन रेड्डी की सरकार ने अवसरवाद की सारी परिभाषा तोड़ दी है। ढाई साल पहले 2019 में जब जगन मोहन रेड्डी के नेतृत्व में प्रचंड बहुमत के साथ वाईएसआर कांग्रेस की सरकार बनी तो विधान परिषद में वाईएसआर कांग्रेस के गिने-चुने सदस्य थे और बहुमत चंद्रबाबू नायडू की टीडीपी का था। सो, जगन मोहन रेड्डी की सरकार ने विधानसभा से एक प्रस्ताव पास करके विधान परिषद खत्म करने की सिफारिश की।

जगन सरकार ने कहा कि विधान परिषद के ऊपर भारी भरकम गैर जरूरी खर्च हो रहा है इसलिए इसे खत्म कर देना चाहिए। उस समय क्योंकि विधान परिषद सरकार के विधेयकों और प्रस्तावों में अड़ंगा डालती थी इसलिए जगन ने इसे खत्म करने का प्रस्ताव पास करा दिया। लेकिन दो साल में हुए कई चुनावों के बाद विधान परिषद में जगन की पार्टी का बहुमत हो गया है। जैसे ही बहुमत हुआ है वैसे ही राज्य सरकार ने विधानसभा से नया प्रस्ताव पास करके कहा है कि विधान परिषद को बनाए रखा जाना चाहिए। संयोग से राज्य विधानसभा के पुराने प्रस्ताव पर केंद्र सरकार ने कोई पहल नहीं की थी। इसलिए जगन मोहन रेड्डी अपने बहुमत वाला विधान परिषद बचाने में कामयाब हो गए हैं। गौरतलब है कि कई और राज्यों ने अपने यहां विधान परिषद बनाने का प्रस्ताव केंद्र को भेजा है, लेकिन केंद्र इस बारे में कोई विचार नहीं कर रहा है।

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