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भारत की राजनीति का स्वीडन कनेक्शन!

भारत में क्या तीन दशक पुराना इतिहास दोहराया जा रहा है? तीन दशक पहले बोफोर्स तोप के विवाद ने कांग्रेस पार्टी को कमजोर करना शुरू किया था और आज तक पार्टी उस आरोप का जवाब दे रही है। बोफोर्स तोप स्वीडन की कंपनी ने बनाया था और भारत में उसकी खरीद के लिए 64 करोड़ रुपए की रिश्वत देने का आरोप लगा था। उसका खुलासा स्वीडिश मीडिया ने ही किया था। उन दिनों भारत में भी मीडिया आजाद हुआ करता था तो उसने इस बहुत बड़ा मुद्दा बना दिया। इसी मुद्दे को लेकर वीपी सिंह मसीहा की तरह उभरे और उन्होंने चार सौ से ज्यादा सांसदों वाली कांग्रेस पार्टी को हरा दिया। यह मामला मिस्टर क्लीन के नाम से मशहूर राजीव गांधी के ऊपर हमेशा के लिए दाग लगा गया।

अब उसी स्वीडन की कंपनी स्कैनिया का उसी तरह का घोटाला सामने आया है। स्वीडन में चूंकि मीडिया आज भी आजाद है इसलिए वहां इसका खुलासा हो गया है पर भारत में इसकी चर्चा नहीं हो रही है। स्वीडिश मीडिया ने बताया है कि स्कैनिया ने भारत में अपनी बसें और ट्रक बेचने के लिए 2013 से 2017 के बीच सात राज्यों में रिश्वत दी। कंपनी ने इस बात को स्वीकार भी किया है और इसकी जांच भी हो रही है।

रिश्वत देने का खुलासा होने के बाद कायदे से यह पता लगाया जाना चाहिए था कि किस राज्य में कितनी बसें खरीदीं गईं और उनमें क्या रिश्वत दी गई, लेकिन भारत में चारों तरफ सन्नाटा पसरा है। बताया जा रहा है कि कई भाजपा शासित राज्यों में सैकड़ों की संख्या में बसें खरीदीं गईं। बसों की खरीद पर जितना रुपया खर्च हुआ उससे ज्यादा रकम कंपनी को बसों की मेंटेनेंस के लिए दी गई। यह रिश्वत का ही कमाल था कि वोल्वो को हटा कर उसकी जगह स्कैनिया की बसें खरीदने का फैसला हुआ था।

बहरहाल, स्वीडन का भारत कनेक्शन यही पर खत्म नहीं होता है। हाल ही में भारत को लोकतंत्र की श्रेणी से हटा कर निर्वाचित तानाशाही वाले देश की श्रेणी में डालने की जो रिपोर्ट आई है वह भी स्वीडन की संस्था वी-डेम ने तैयार की है। उससे पहले अमेरिकी संस्था फ्रीडम हाउस ने तो भारत को आंशिक रूप से लोकतांत्रिक देश बताया था लेकिन स्वीडिश संस्था वी-डेम ने भारत को निर्वाचित तानाशाही वाला देश बता दिया। यह भी संयोग है कि भारत में चल रहे किसान आंदोलन को समर्थन करने वाली पर्यावरण कार्यकर्ता ग्रेटा थनबर्ग भी स्वीडन की हैं।

कनाडा के प्रधानमंत्री को छोड़ दें तो ग्रेटा थनबर्ग पहली मशहूर विदेशी हस्ती हैं, जिन्होंने भारत में चल रहे किसान आंदोलन का समर्थन किया। उन्होंने किसान आंदोलन को ज्यादा से ज्यादा लोगों तक ले जाने के लिए एक टूलकिट भी शेयर किया, जिस मामले में भी भारत में कई सामाजिक कार्यकर्ता जांच के दायरे में आए हैं। भारत सरकार की हर आलोचना की पीछे विदेशी साजिश देखने वाले लोग इन सबमें स्वीडन की साजिश देख सकते हैं।

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