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डीएमके की रणनीति हैं अकेले बहुमत!

तमिलनाडु में मुख्यम विपक्षी पार्टी डीएमके की रणनीति अकेले दम पर बहुमत हासिल करने की है। इसलिए उसने कांग्रेस सहित तमाम दूसरी पार्टियों को कम से कम सीटें देकर गठबंधन में शामिल किया है। पार्टी के नेताओं का कहना है कि अगर पिछले चुनाव में ही डीएमके ने कांग्रेस को 41 सीटें नहीं दी होतीं तो उसी समय उसकी सरकार बन जाती। जैसे बिहार में कहा जा रहा है कि अगर राजद ने कांग्रेस को 70 सीटें नहीं दी होती तो आज राज्य की तस्वीर अलग होती। राजद की सरकार बन सकती थी। ऐसा लग रहा है कि बिहार के ताजा अनुभव से सबक लेकर डीएमके ने कांग्रेस को किनारे किया है और बाकी सहयोगियों से भी सख्त मोलभाव करके कम कम सीटें दी हैं।

ध्यान रहे पिछले चुनाव में डीएमके ने कांग्रेस के लिए 41 सीटें छोड़ी थीं, जिनमें से कांग्रेस सिर्फ सात सीट जीत पाई थी। इस बार डीएमके ने कांग्रेस को 25 सीटें दी हैं। इसके अलावा सीपीआई, सीपीएम और वीसीके को छह-छह सीटें दी हैं। इसके अलावा इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग को तीन और एमएमके को दो सीटें दी हैं। यानी छह बड़ी सहयोगियों को कुल मिला कर 48 सीटें दी हैं। वाइको की पार्टी एमडीएमके को भी उन्होंने छह सीटें दी हैं पर उनके उम्मीदवार डीएमके के चुनाव चिन्ह उगते सूरज पर चुनाव लड़ेंगे। सो, वे डीएमके के ही उम्मीदवार माने जाएंगे। इसके अलावा एमके स्टालिन ने टीवीके, एटीपी और एमवीके को एक-एक सीटें दी हैं पर इनके उम्मीदवार भी डीएमके के चुनाव चिन्ह पर लड़ेंगे। इस तरह स्टालिन ने 10 पार्टियों का गठबंधन बनाया है, जिसमें से 48 उम्मीदवार ही अलग चुनाव चिन्ह पर लड़ेंगे। बाकी 186 उम्मीदवार डीएमके के चुनाव चिन्ह पर लड़ेंगे। इनमें से स्टालिन का लक्ष्य अकेले 118 सीट जीत कर बहुमत हासिल करने का है।

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