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किसान आंदोलन और शाहीन बाग का फर्क

केंद्र सरकार के कृषि कानूनों के खिलाफ छह महीने से आंदोलन कर रहे किसान कहीं नहीं जा रहे हैं। वे दिल्ली को तीन तरफ से घेरे रहेंगे और सीमा पर बैठे रहेंगे। आंदोलन के छह महीने पूरे होने के मौके पर किसानों के नेता राकेश टिकैत ने कहा कि जरूरत पड़ी तो किसान 2024 तक यानी अगले लोकसभा चुनाव तक आंदोलन करते रहेंगे। उन्होंने आंदोलन कर रहे किसानों की वजह से कोरोना फैलने की बातों को खारिज करते हुए कहा कि जो किसान, जहां है वहीं से आंदोलन कर रहा है इसलिए यह सुपर स्प्रेडर इवेंट नहीं है।

सो, यह तय है कि किसान आंदोलन का हस्र नागरिकता संशोधन कानून पर शाहीन बाग में हुए आंदोलन वाला नहीं होने जा रहा है। कोरोना की पहली लहर में शाहीन बाग का आंदोलन खत्म हो गया था। पहले आंदोलन में शामिल लोगों की संख्या धीरे धीरे कम हुई और उसके बाद चुपचाप आंदोलन खत्म हो गया। एक समय दिल्ली के शाहीन बाग से लेकर देश के दूर-दराज तक के हिस्सों में सीएए विरोधी आंदोलन चल रहा था। लेकिन वायरस की पहली लहर ने इसे खत्म कर दिया। ऐसा लग रहा था कि कोरोना की दूसरी लहर में किसान आंदोलन खत्म हो जाएगा क्योंकि आंदोलन की जगह पर किसानों की संख्या भी कम होने लगी थी।

इसी बीच किसान आंदोलन को कोरोना का सुपर स्प्रेडर इवेंट बता कर बदनाम करने का अभियान भी शुरू हो गया था। सत्तापक्ष की ओर से कहा जाने लगा था कि अगर कुंभ से कोरोना फैलता है या चुनावी रैलियों से कोरोना फैलता तो क्या किसान आंदोलन से नहीं फैलता है। सोशल मीडिया में इसे लेकर बहुत माहौल बनाया गया और इसका नतीजा यह हुआ है कि किसान आंदोलन के समर्थक या अपने को किसानों का हितैषी बताने वाले कई पत्रकारों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने भी किसान आंदोलन को खत्म करने की अपील करनी शुरू कर दी। यह कहा जाने लगा कि किसान आंदोलन खत्म करके लौट जाएं, ऑनलाइन आंदोलन करें और कोरोना खत्म हो तो फिर आंदोलन के लिए लौटें।

भारत सरकार भी इसी इंतजार में बैठी रही। उधर सुप्रीम कोर्ट में भी अदालत की बनाई कमेटी के रिपोर्ट दाखिल कर देने के बाद भी सुनवाई नहीं हुई। यानी सब तरफ यथास्थिति बनी रही इस उम्मीद में कि किसान कोरोना के कारण चले जाएंगे। लेकिन किसानों ने आंदोलन खत्म करने की बजाय सरकार से बातचीत की अपील की है और कहा है वे महीनों तक आंदोलन पर डटे रहने के लिए तैयार हैं। इस बीच अच्छी खबर यह है कि पंजाब और हरियाणा दोनों राज्यों में, जहां के किसान आंदोलन में सबसे ज्यादा संख्या में हैं वहां इस साल बंपर फसल हुई है। छह महीने से चल रहे आंदोलन के बीच रिकार्ड उत्पादन ने किसानों का हौसला बढ़ाया है। उनको लग रहा है कि वे दोनों काम यानी आंदोलन और खेती-किसानी साथ साथ कर सकते हैं। इसलिए कम से कम अभी तत्काल आंदोलन खत्म होता नहीं दिख रहा है। इसे खत्म कराने का यही तरीका है कि सरकार किसानों से बात करे।

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