यूपी में राजनीतिक प्रतीक बन गए हैं आजम खां

समाजवादी पार्टी के सांसद आजम खां की मुश्किलें कम होने का नाम नहीं ले रही हैं। पिछले साल मई में जब से वे लोकसभा के लिए चुने गए हैं तब से उनकी मुश्किलों का दौर शुरू हुआ है और धीरे धीरे बढ़ता ही जा रहा है। हालांकि लखनऊ में कई जानकार मान रहे हैं कि उनकी मुश्किलों की शुरुआत भले पिछले साल हुई है पर इसकी बुनियाद राज्य में योगी आदित्यनाथ की कमान में भाजपा की सरकार बनने के साथ ही रख दी गई थी। असल में भाजपा ने हमेशा आजम खां को सपा, बसपा और कांग्रेस की कथित मुस्लिम तुष्टिकरण की नीति का प्रतीक माना है। मुख्तार अंसारी या अतीक अहमद के मुकाबले भाजपा ने आजम को हमेशा बड़े राजनीतिक प्रतीक के तौर पर इस्तेमाल किया है।

तभी योगी की सरकार आने के बाद से कहा जा रहा था कि उनकी मुश्किलें बढ़ेंगी। पर मुश्किलें बढ़नी शुरू हुईं पिछले साल मई में जब बेहद कड़वाहट के साथ लड़े गए लोकसभा चुनाव में उन्होंने रामपुर सीट पर जया प्रदा को हराया। उसके बाद उनके बनवाए जौहर विश्वविद्यालयों की जमीन और लाइब्रेरी का विवाद हुआ। जमीन के गलत अधिग्रहण और लाइब्रेरी के लिए किताबों की चोरी का मामला दर्ज हुआ। आचार संहिता उल्लंघन के मामले दायर हुए और बेटे अब्दुल्ला आजम के चुनाव को चुनौती मिली। अब स्थिति यह है कि आजम खां के बेटे की विधायकी अदालत ने खत्म कर दी है और खुद आजम को एक महीने में तीसरी बार भगोड़ा घोषित करके वारंट जारी हुआ है। उनके ऊपर एक सौ के करीब मामले दर्ज हो गए हैं।

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