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भारत में वैक्सीन का तमाशा

दुनिया भर के देशों में वैक्सीनेशन अभियान कोरोना वायरस के संक्रमण पर रोक लगाने के लिए चल रहा है तो भारत में यह एक तमाशे की तरह है। इससे जुड़ी कई बातें समझ से परे हैं। जैसे पिछले दिनों सरकार ने सीरम इंस्टीच्यूट में बन रही ऑक्सफोर्ड-एस्ट्राजेनेका की वैक्सीन कोवीशील्ड की छह महीने पहले बनी डोज को भी लगाने की मंजूरी दे दी।

पहले कंपनी ने इस पर जो लेबल लगाया था उस पर लिखा था वैक्सीन की डोज छह महीने में एक्सपायर हो जाएगी। लेकिन अब कहा जा रहा है कि जिन वायल पर यह लेबल नहीं चिपकाया गया था उन पर नया लेबल यह लगाया जाए कि वैक्सीन की डोज नौ महीने में एक्सपायर होगी। सोचें, सरकार ने एक्सपायर डोज लगाने की मंजूरी दे दी और किसी को यह नहीं पता है कि ऐसा किस रिसर्च के आधार पर किया गया है।

उसके बाद खबर आई है कि वैक्सीन का असर छह-आठ महीने से ज्यादा नहीं रहेगा। यानी साल में एक बार या दो बार यह वैक्सीन लगवाने की जरूरत है। यहां भारत में तो करीब 44 फीसदी लोग दूसरी डोज नहीं लगवा रहे हैं वहां तीसरी या चौथी डोज कितने लोग लगवाएंगे! यह लिखे जाने तक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के भी दूसरी डोज लगवाने की फोटो नहीं आई है। उन्होंने भारत बायोटेक में बनी कोवैक्सीन का टीका एक मार्च को लगवाया था। इस लिहाज से उन्हें 28 या29 मार्च को दूसरी डोज लगवानी थी। चूंकि भारत में 44 फीसदी लोग दूसरी डोज नहीं लगवा रहे हैं इसलिए प्रधानमंत्री को दूसरी डोज की फोटो सार्वजनिक करनी चाहिए ताकि लोगों को प्रेरणा मिल सके। ध्यान रहे जो लोग दूसरी डोज लगवाएंगे वहीं लोग आगे तीसरी या चौथी डोज भी लगवाएंगे।

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