सीटों की ताजा भाजपाई हवाबाजी! - Naya India
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सीटों की ताजा भाजपाई हवाबाजी!

भारतीय जनता पार्टी के पूर्व अध्यक्ष और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने दावा किया है कि पश्चिम बंगाल में पांच चरण में जिन 180 सीटों पर मतदान हुआ है उसमें से भाजपा 122 जीत चुकी है। उनसे पहले चौथे चरण तक 135 सीटों के मतदान के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दावा किया था कि भाजपा शतक लगा चुकी है। इसका मतलब है कि पांचवें चरण की 45 में से भाजपा अधिकतम 22 सीट जीतने का दावा कर रही है। पहले तीन चरण के मतदान में भाजपा ने बड़े दावे किए थे लेकिन चौथे और पांचवें चरण में भाजपा ने पहले के मुकाबले कम सीटें जीतने का दावा किया।

देश के प्रधानमंत्री और गृह मंत्री दोनों जिस पोजिशन में हैं वहां बैठे नेता का इतना सटीक दावा कई सवाल खड़े करता है। जैसे यह कि आखिर दोनों इतने पक्के तौर पर सीटों की संख्या कैसे बता रहे हैं? अगर सचमुच इतनी ही सीटें आईं तो क्या इससे यह आरोप नहीं लगेगा कि ईवीएम से छेड़छाड़ हुई है और इसलिए सरकार को पहले से पता था कि सरकारी पार्टी कितनी सीटें जीतेगी? यह भी सवाल है कि अगर इतनी सीटें नहीं आती हैं तो क्या झूठे, गलत या भ्रामक दावे करने के लिए दोनों माफी मांगेंगे? एक सवाल यह भी है कि क्या यह चुनाव आचार संहिता का उल्लंघन नहीं है?

इन सवालों से इतर यह तथ्य है कि इससे पहले एक दर्जन बार अमित शाह के दावे गलत साबित हुए हैं। चुनाव जीतने के जितने उनके दावे सही हुए हैं उससे ज्यादा गलत हुए हैं। पांच-छह महीना पहले हुए बिहार चुनाव में अमित शाह ने कई सभाओं में दो-तिहाई सीट जीतने का दावा किया था। लेकिन उनका गठबंधन बड़ी मुश्किल से बहुमत का आंकड़ा पार कर पाया। उनके गठबंधन के 125 और विपक्षी गठबंधन को 115 सीटें मिलीं। उससे पहले अमित शाह ने दिल्ली के चुनाव में 45 सीट जीतने का दावा किया था लेकिन उनकी पार्टी सिर्फ आठ सीट जीत सकी।

उससे पहले झारखंड चुनाव में अमित शाह ने 65 सीट जीतने की घोषणा की थी लेकिन उनकी पार्टी को गिरते-पड़ते 25 सीटें मिलीं। हरियाणा में भाजपा का लक्ष्य 65 से ज्यादा सीट जीतने का था लेकिन उसे जैसे तैसे 40 सीटें मिल पाईं। महाराष्ट्र में पूर्ण बहुमत हासिल करने के दावे के बावजूद भाजपा सिर्फ 105 सीट जीत पाई। अपने गृह राज्य गुजरात में उनका दावा सही साबित नहीं हो सका था। असल में भाजपा लक्ष्य तय करने में पीछे नहीं रहती है। पार्टी हमेशा भारी-भरकम लक्ष्य तय करती है और चुनाव के बीच इस बात का डंका बजाया जाता है कि जीत गए, भाई जीत गए और जब चुनाव खत्म हो जाता है, पार्टी हार जाती है या तय लक्ष्य से बहुत कम सीटें उसे मिलती हैं तो सारे लक्ष्य, दावे आदि भुला दिए जाते हैं। यह भाजपा की मनोवैज्ञानिक लड़ाई का एक दांव है। चूंकि यह दांव सीधे प्रधानमंत्री और गृह मंत्री आजमाते हैं इसलिए इसका कुछ हद तक असर भी होता है।

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