बंगाल चुनाव की तारीखों पर विवाद - Naya India
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बंगाल चुनाव की तारीखों पर विवाद

केंद्रीय चुनाव आयोग ने पश्चिम बंगाल में आठ चरणों में चुनाव कराने का ऐलान किया है। पांच साल पहले 2016 में भी बंगाल में सात चरणों में चुनाव हुए थे। सो, इस बार सात की जगह आठ चरण में चुनाव हो रहा है तो यह कोई बहुत हायतौबा मचाने वाली बात नहीं होनी चाहिए। फिर भी चुनाव तारीखों पर विवाद है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने आरोप लगाया है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह के हिसाब से तारीख तय की गई है। राजनीतिक दलों की बात छोड़ें तब भी दो बातें ऐसी हैं, जिनका चुनाव आयोग को ध्यान रखना चाहिए था। पहली बात तो यह है कि जब मतदान 29 अप्रैल तक चलना था तो चार राज्यों में छह अप्रैल तक मतदान खत्म नहीं करना चाहिए था।

ध्यान रहे असम, केरल, तमिलनाडु और पुड्डुचेरी में छह अप्रैल को मतदान खत्म हो जाएगा और वहां के लोगों को दो मई तक नतीजों का इंतजार करना होगा। केरल, तमिलनाडु और पुड्डुचेरी में तो एक ही चरण में छह अप्रैल को मतदान है। आयोग चाहता तो यह चुनाव आखिरी चरण में यानी 29 अप्रैल को भी करा सकता था। हालांकि आचार संहिता दोनों स्थितियों में चुनाव की घोषणा के दिन ही लग जाती पर यह तथ्य है कि मतदान से पहले तक सरकारें काम करती रहती हैं। लेकिन मतदान के बाद सिर्फ नतीजों का इंतजार होता है। सो, असम, केरल, तमिलनाडु और पुड्डुचेरी में एक महीने तक इंतजार होगा, सस्पेंस रहेगा और जहां ईवीएम रखे होंगे उस स्ट्रांग रूम की निगरानी होगी।

दूसरी बात यह है कि चुनाव आयोग को अब कई चरणों में चुनाव कराने की बजाय मतदान के चरण कम करने चाहिए। जैसे पिछली बार अगर सात चरण में चुनाव हुए थे तो इस बार छह चरण में या पांच चरण में चुनाव कराना चाहिए। अब तकनीक विकसित हो गई है, बूथ लूट की घटनाएं लगभग बंद हो गई हैं, मीडिया और सोशल मीडिया के जरिए लगातार निगरानी संभव है ऐसे में आठ चरण में चुनाव कराने की तुक नहीं है। जैसे पिछले ही साल बिहार में चुनाव आयोग ने सिर्फ तीन चरण में चुनाव कराए, जबकि उससे पहले पांच चरण में चुनाव हुए थे। उसी तरह बंगाल में या दूसरे किसी भी राज्य में आयोग को कोशिश करनी चाहिए कि कम से कम चरण में चुनाव हों।

 

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ये दर्दनाक दास्तां।।
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