भाजपा ने जो चाहा, आयोग ने वो किया!

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भारतीय जनता पार्टी नहीं चाहती थी कि पश्चिम बंगाल में बचे हुए चार चरणों का या कम से कम आखिरी तीन चरणों का मतदान एक साथ हो। तभी राज्य की सबसे बड़ी पार्टी सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस के मांग करने और बाकी विपक्षी पार्टियों के परोक्ष समर्थन के बावजूद केंद्रीय चुनाव आयोग ने बंगाल में बचे हुए चऱणों का मतदान एक साथ कराने से इनकार कर दिया। चुनाव आयोग ने सभी पार्टियों की बैठक में दो टूक अंदाज में कह दिया कि मतदान पहले से तय कार्यक्रम के मुताबिक आठ चरण में ही होंगे।

असल में कोरोना वायरस के बढ़ते मामलों को देखते हुए मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने सुझाव दिया था कि बचे हुए चरणों का मतदान एक साथ करा लिया जाए। यह अच्छा और तार्किक सुझाव था, जिस पर चुनाव आयोग को खुले दिमाग से विचार करना चाहिए था। पर इसकी बजाय उसने भाजपा की बात सुनी, जिसने एक अजीब सा तर्क दिया कि पहले पांच चरणों में मतदाताओं को जो मौका मिला है वहीं मौका बाकी तीन चरणों में भी मतदाताओं को मिलना चाहिए। सवाल है कि पार्टियां प्रचार करती हैं तो उसमें जनता को क्या मिलता है? नेता प्रचार करते हैं, रैलियां करते हैं, भेड़ियाधसान भीड़ उसमें शामिल होती है, नेताओं की लफ्फाजी और झूठी बातें सुनती हैं, इससे आम लोगों को क्या मिलता है? क्या भाजपा यह कहना चाह रही थी कि पहले चरण में लोगों को पीएम की रैलियों में शामिल होने और भाषण सुनने का सौभाग्य मिला है वह बाकियों को भी मिलना चाहिए?

बहरहाल, भाजपा के इस अजीबोगरीब तर्क के बाद चुनाव आयोग ने बचे हुए चरणों का मतदान एक साथ कराने से इनकार कर दिया। लेकिन उसके बाद आयोग ने जो किया उससे उसकी मंशा पर सवाल खड़े होते हैं और ममता बनर्जी के आरोपों में सचाई दिखती है। चुनाव आयोग ने बचे हुए तीन चरणों के मतदान में प्रचार का समय घटा दिया है। अब शाम सात बजे के बाद और सुबह 10 बजे से पहले प्रचार नहीं हो पाएगा। यानी अब सिर्फ नौ घंटे प्रचार होगा। साथ ही आयोग ने 48 घंटे की बजाय 72 घंटे पहले प्रचार बंद करने का फैसला किया है। रैलियों को लेकर भी नए नियम बनाए गए हैं।

असल में पश्चिम बंगाल में आठ चरण में चुनाव कराने के पक्षपातपूर्ण फैसले के बाद आयोग ने यह भी किया कि आखिरी तीन चरण में उन इलाकों में मतदान रखा, जहां तृणमूल कांग्रेस का मजबूत असर है। उससे पहले पांच चरण में भाजपा नेताओं ने प्रचार करके खूब हवा बनाई, जीत के दावे किए, जिसका मकसद आखिरी तीन चरण में मतदाताओं को प्रभावित करना था। जाने-अनजाने में हुए आयोग के फैसले से भाजपा को काफी हद तक फायदा हुआ। हालांकि ममता बनर्जी खुद चाहती थीं कि बचे हुए तीन चरणों में एक साथ मतदान हो जाए इसलिए प्रचार सीमित करने का उनको कोई खास नुकसान नहीं होगा। फिर भी आयोग ने अपनी तरफ से कोई कसर नहीं छोड़ी है।

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साभार - ऐसे भी जानें सत्य

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