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बंगाल में राजनीति से भागती भाजपा!

भारतीय जनता पार्टी पश्चिम बंगाल में राजनीति नहीं कर रही है, बल्कि राजनीति से भाग रही है। उसे प्रदेश की जनता ने एक मजबूत विपक्ष चुना है। उसके पास 75 विधायक हैं और मुख्यमंत्री को हराना वाला नेता पार्टी के विधायक दल का नेतृत्व कर रहा है। भाजपा को 38 फीसदी वोट मिले हैं। यानी लोकसभा चुनाव में जीतने लोगों ने नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री बनाने के लिए वोट दिया था, उससे सिर्फ दो फीसदी कम लोगों ने राज्य में सरकार बनाने के लिए भाजपा को वोट दिया। यह मामूली बात नहीं है। दूसरे राज्यों में लोकसभा के मुकाबले भाजपा के वोट में दस-दस फीसदी तक की कमी आई है। लेकिन बंगाल में सिर्फ दो फीसदी का अंतर आया। लगातार दो चुनावों में 38 फीसदी या उससे ज्यादा वोट हासिल करना दिखाता है कि पार्टी एक मजबूत आधार बना चुकी है, जिस पर वह दीर्घावधि में राजनीति कर सकती है।

लेकिन हैरानी की बात है कि पार्टी राजनीति नहीं कर रही है। भाजपा का कोई राजनीतिक अभियान अभी तक नहीं दिखा है। राज्य के कुछ हिस्सों में हुई हिंसा के बाद पांच मई को प्रदर्शन करने की घोषणा के अलावा पार्टी का कोई राजनीतिक एजेंडा नहीं दिख रहा है। इसकी बजाय भाजपा राज्यपाल, केंद्र सरकार और केंद्रीय एजेंसियों का ज्यादा इस्तेमाल कर रही है। यह मजबूत विपक्ष का काम नहीं है। यह काम वहां हो सकता है, जहां पार्टी कमजोर हो या पार्टी का आधार नहीं हो। वहां केंद्रीय मंत्रियों को भेज कर या केंद्रीय एजेंसियों के जरिए या राज्यपाल के जरिए पार्टी चुनी हुई सरकार पर दबाव बना सकती है। लेकिन जहां उसके पास 75 विधायक हों और 38 फीसदी वोट हो वहां पार्टी को जमीनी राजनीति करनी चाहिए।

बंगाल में इसका उलटा हो रहा है। वहां भाजपा जमीनी राजनीति से भाग रही है। राज्य में चुनाव नतीजे आए हुए 22 दिन हो गए हैं और शुभेंदु अधिकारी के विधायक दल का नेता चुने गए भी दो हफ्ते हो गए लेकिन वे क्या कर रहे हैं यह किसी को पता नहीं है। कहीं से शुभेंदु अधिकारी की कोई खबर नहीं आई है। इसी तरह मुकुल रॉय क्या कर रहे हैं या पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष, जो चुनाव के दौरान बेहद सक्रिय थे, वे कहां हैं, यह भी पता नहीं है। पार्टी ने पांच सांसदों को चुनाव मैदान में उतारा था, जिनमें से तीन हार गए और जीते हुए दो सांसदों ने विधानसभा से इस्तीफा दे दिया। वे सब अपने पुराने खोल में लौट गए दिखते हैं।

बंगाल में भाजपा के राजनीति करने की बजाय सिर्फ यह खबर आ रही है कि सीबीआई ने नारद स्टिंग ऑपरेशन मामले में तृणमूल के चार विधायकों को गिरफ्तार कर लिया या राज्यपाल ने हिंसा प्रभावित क्षेत्रों का दौरा किया या राज्यपाल ने पुलिस प्रमुख को बुला कर राजभवन की सुरक्षा के बारे में जवाब-तलब किया या केंद्रीय मंत्री ने हिंसा प्रभावित क्षेत्रों का दौरा किया। कायदे से तो नेता विपक्ष शुभेंदु अधिकारी को हिंसा प्रभावित क्षेत्रों का दौरा करना चाहिए और उसे लेकर कोई आंदोलन खड़ा करना चाहिए! भाजपा की बजाय अब भी ममता बनर्जी ही राजनीति करती ज्यादा दिख रही हैं। चाहे सीबीआई के दफ्तर में छह घंटे बैठे रहने का मामला हो या प्रधानमंत्री की बैठक में नहीं बोलने देने का मुद्दा उठाने की बात हो, वे राजनीतिक मोर्चे पर ज्यादा सक्रिय दिख रही हैं।

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