nayaindia west bengal politics Mamta banerjee आरएसएस के दांव का ममता
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आरएसएस के दांव का ममता को क्या फायदा?

ममता बनर्जी की राजनीतिक ऊपर से जितनी अव्यवस्थित और अस्त-व्यस्त दिखती है, असल में उतनी होती नहीं है। वे स्ट्रीट फाइटर हैं लेकिन हमेशा सोच-समझ कर राजनीति की है। ऐसा लगता है कि वे अचानक कोई बात कह रही हैं या अचानक अपना रुख तय कर रही हैं लेकिन हर बार वे सुनियोजित तरीके से फैसला करती हैं। कांग्रेस से अलग होने के बाद उन्होंने बहुत होशियारी से अपने को कांग्रेस और लेफ्ट लिबरल राजनीति से दूर दिखाया था क्योंकि उन्होंने पश्चिम बंगाल में कांग्रेस और लेफ्ट दोनों को खत्म करना था। तब वे अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में भी शामिल हुई थीं और आरएसएस की तारीफ भी की थी। उन्होंने आरएसएस को देशभक्त संगठन बताया था। इस तरह उन्होंने पश्चिम बंगाल में भाजपा को जो भी स्पेस बन रहा था उसे हथिया लिया था।

एक बार फिर उन्होंने आरएसएस का दांव चला है। उनकी जितनी भी आलोचना की जाए लेकिन इसमें संदेह नहीं है कि यह दांव अगर कारगर हुआ तो वे 2024 के लोकसभा चुनाव में 2014 वाला नतीजा दोहरा सकती हैं। 2014 में ममता बनर्जी की पार्टी ने राज्य की 42 लोकसभा सीटों में से 34 सीटें जीती थीं। इस बार वे बंगाली अस्मिता का दांव चल कर राज्य की ज्यादा से ज्यादा सीटें जीतने का प्रयास कर रही हैं। इसमें उनका आरएसएस का दांव काम आएगा। वे आरएसएस और भाजपा के जमीनी कार्यकर्ताओं में यह मैसेज दे रही हैं कि भाजपा पहले वाली पार्टी नहीं है और उसने तृणमूल, कांग्रेस व लेफ्ट के नेताओं को तोड़ कर ही अपनी पार्टी बनाई है। सो, उनसे बेहतर ममता की पार्टी है।

इसके साथ ही ममता बनर्जी बहुसंख्यक हिंदू मतदाताओं को पूरी तरह से अपने खिलाफ होने से रोकने का प्रयास कर रही हैं। उनके मुस्लिमपरस्त होने की धारणा इससे टूटेगी। उनको पता है कि मुसलमान के सामने वहां तृणमूल के अलावा कोई विकल्प नहीं है। इसलिए उसका वोट तो मिलेगा ही साथ ही हिंदू खिलाफ होकर तृणमूल को हराने के लिए वोट नहीं करेगा।

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