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Sunday, April 18, 2021
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भाजपा नेतृत्व को क्या हुआ?

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भारतीय जनता पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व की ताकत ऐसी मानी जाती है, जैसे किसी जमाने में कांग्रेस के अंदर इंदिरा गांधी की होती थी या कुछ समय तक सोनिया गांधी की भी थी। पर अब ऐसा लग रह है कि भाजपा का राष्ट्रीय नेतृत्व कमजोर हुआ है या फैसले करने में हिचक रहा है। भाजपा में फैसले करने में वैसी ही देरी होने लगी है, जैसे कांग्रेस में 2014 के बाद से हो रही है। मिसाल के तौर पर पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा को अपनी टीम बनाने में लगे समय को ही लिया जा सकता है। उनको छह महीने से ज्यादा लग गए थे अपनी टीम बनाने में।

अभी कई मामलों में ऐसा दिख रहा है कि भाजपा नेतृत्व फैसला नहीं कर पा रहा है या उसके फैसले पर सवाल उठ रहे हैं। उत्तर प्रदेश में कैबिनेट का विस्तार होना है लेकिन कई महीनों से इसकी सिर्फ चर्चा हो रही है। कहा जा रहा है कि मंत्रियों के नाम पर सहमति नहीं बन पा रही है। सोचें, कहां तो कुछ दिन पहले नरेंद्र मोदी और अमित शाह, जिसको चाहते थे मुख्यमंत्री बना देते थे और अब मंत्री बनाने के मामले में सहमति नहीं बन रही है! खबर है कि दिल्ली से भेजे गए प्रधानमंत्री मोदी के करीबी अधिकारी रहे अरविंद शर्मा को उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ न तो उप मुख्यमंत्री बनाने को राजी है और न गृह व कार्मिक मंत्रालय देने को। जानकार सूत्रों के मुताबिक यह भी खबर है कि दिल्ली से जाने के बाद चार दिन तक मुख्यमंत्री उनसे मिले ही नहीं। उनके अलावा कई और नामों पर सहमति नहीं बन रही है।

ऐसे ही बिहार में मंत्रिमंडल का विस्तार नहीं हो पा रहा है और न विधान परिषद के सदस्यों की संख्या तय हो पा रही है। राज्य में सरकार बने तीन महीने होने जा रहे हैं और सिर्फ 14 मंत्रियों से सरकार चल रही है, जबकि बिहार में 37 मंत्री बनाए जा सकते हैं। भाजपा नेतृत्व ने एनडीए की बैठक में शामिल होने के लिए लोजपा नेता चिराग पासवान को बुलाया तो मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने उनका बैठक में शामिल होना रूकवाया। बैठक वर्चुअल थी फिर भी चिराग पासवान को सेहत खराब नहीं होने के बहाने बैठक से दूर रहना पड़ा।

उधर कर्नाटक में बीएस येदियुरप्पा ने मंत्रिमंडल का विस्तार किया तो दस दिन के भीतर तीन-तीन बार मंत्रियों के विभाग बदलने पड़े। भाजपा का राष्ट्रीय नेतृत्व वहां के घटनाक्रम को कंट्रोल नहीं कर पा रहा है। बताया जा रहा है कि पार्टी के नए संगठन महामंत्री बीएल संतोष और मुख्यमंत्री येदियुरप्पा में ठनी है। इसका मतलब है कि संघ को भी येदियुरप्पा पसंद नहीं हैं और भाजपा नेतृत्व तो उनको बदलना चाहता ही है लेकिन वे अपनी जगह पर जमे हैं। झारखंड में भाजपा के शीर्ष नेतृत्व ने पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी को बड़े जोर-शोर से प्रचार करके पार्टी में शामिल कराया था पर हकीकत है कि प्रदेश भाजपा कई धड़ों में बंटी है और केंद्र की सदिच्छा के बावजूद कोई मरांडी को नेता नहीं मान रहा है।

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