सूक्ष्म व लघु उद्योगों के पैकेज का क्या हुआ?

यह हैरान करने वाली बात है पर चूंकि खुद सरकार ने कही है इसलिए भरोसा नहीं करने का कोई कारण नहीं है। केंद्र सरकार ने संसद की स्थायी समिति के सामने कहा है कि सूक्ष्म, लघु व मझोले उद्योगों यानी एमएसएमई सेक्टर में 10 करोड़ लोगों के रोजगार के सामने संकट है। सवाल है कि जब सरकार सबसे ज्यादा ध्यान इसी सेक्टर पर दे रही है और कोरोना संक्रमण की वैश्विक आपदा को अवसर बनाते हुए आत्मनिर्भर भारत अभियान के तहत 21 लाख करोड़ रुपए के पैकेज में सबसे ज्यादा पैसे इसी सेक्टर को देने की बात हुई तो यह हालत क्यों है?

ध्यान रहे मई में प्रधानमंत्री की घोषणा के बाद वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने जब धारावाहिक के रूप में आत्मनिर्भर भारत पैकेज के बारे में बताना शुरू किया तो पहले दिन उन्होंने एमएसएमई सेक्टर को दिए जाने वाले राहतों की ही जानकारी दी। उन्होंने बताया कि एमएसएमई के लिए तीन लाख करोड़ रुपए के बिना गारंटी के कर्ज की सुविधा दी जाएगी। वित्त मंत्री ने कहा कि एमएसएमई भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ है। इनको तीन लाख करोड़ रुपए कोलेट्रल फ्री ऑटोमेटिक लोन दिया जाएगा। इसमें किसी तरह की गारंटी या कोलेट्रल की जरूरत नहीं होगी। वित्त मंत्री ने कहा कि पहले इस सेक्टर को आकार और क्षमता बढ़ाने की सुविधा नहीं मिलती थी इसलिए अब फंड्स ऑफ फंड्स का प्रावधान किया गया है।

केंद्र सरकार ने एमएसएमई सेक्टर की परिभाषा भी बदली। इसके बावजूद हालात यह हैं कि 10 करोड़ लोगों के रोजगार पर खतरा है। ऐसा इसलिए है क्योंकि संकट के इस समय में भी सरकार किसी के हाथ में नकद नहीं दे रही है। वह चाहती है कि छोटे व मझोले उद्योग वाले कर्ज लेकर अपना काम चलाएं। उनकी मुश्किल यह है कि उनके यहां पहले से जो उत्पाद बने हैं और उनका कोई खरीदार नहीं है तो वे कर्ज लेकर क्या करेंगे। यह कर्ज की अर्थव्यवस्था चलाने की सोच का अनिवार्य नतीजा है।

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