सूचना अधिकार कानून की क्या हालत हो गई!

भारत में वास्तव में देश के लोगों को और लोकतंत्र को भी सशक्त बनाने के लिए नई सदी में जो कानून बने हैं उनमें सबसे ऊपर सूचना के अधिकार कानून को रखा जाएगा। यह कानून सच में लोगों को ताकत देने वाला है। गलत काम करने वाले इससे कितना घबराते हैं इसकी मिसाल यह है कि देश में पिछले 15 साल में सैकड़ों की संख्या में आरटीआई कार्यकर्ताओं पर हमले हुए हैं और उनकी हत्या हुई है। पर अब हकीकत यह है कि पिछले कुछ बरसों में व्यवस्थित तरीके से इस कानून को कमजोर किया जा रहा है और इसका महत्व घटाया जा रहा है। कुछ समय पहले ही प्रधानमंत्री कार्यालय ने पीएम केयर्स फंड का ब्योरा आरटीआई के तहत जारी करने से इनकार किया है।

बहरहाल, यह स्थिति सिर्फ केंद्र की नहीं है, राज्यों में भी ऐसे ही हालात हैं। देश के 29 राज्यों में सूचना आयोग हैं पर हकीकत यह है कि नौ राज्यों में यह आयोग बिना अध्यक्ष के काम कर रहा है। कई राज्यों में तो महीनों से मुख्य सूचना आयुक्त नहीं हैं। झारखंड में तो यह आयोग एक तरह से भंग ही हो गया है। एक साल से राज्य विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष नहीं हैं इसलिए सूचना आयुक्तों की नियुक्ति की बैठक नहीं हो रही है। केंद्रीय सूचना आयोग में भी मुख्य सूचना आयुक्त बिमल जुल्का अगस्त में रिटायर हो गए और उनकी जगह किसी की नियुक्ति नहीं हुई है। देश भर में सूचना आयोगों के सामने सवा दो लाख के करीब मामले लंबित है, जिनकी संख्या आने वाले दिनों में बढ़ने ही वाली है। जहां पर आयोग काम कर भी रहे हैं वहां भी आवेदन महीनों तक लटके रह रहे हैं और किसी न किसी तरीके से जवाब देना टाला जा रहा है।

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