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दवा बांटने की क्या राजनीति है?

देश में इस समय कई नेता, अभिनेता और सामाजिक कार्यकर्ता कोरोना वायरस से संक्रमितों की मदद कर रहे हैं। वे अपने संपर्कों और नेटवर्क के जरिए किसी को ऑक्सीजन के सिलिंडर उपलब्ध करा रहे हैं या अस्पतालों में बेड्स उपलब्ध करा रहे हैं। किसी को जीवनरक्षक दवाओं की जरूरत है तो वह भी उपलब्ध करा रहे हैं। जैसे यूथ कांग्रेस के श्रीनिवास बीवी ने एक हजार वालंटियर्स का नेटवर्क बना रखा है, जिनके जरिए वे लोगों की मदद कर रहे हैं। चाहे श्रीनिवास हों या आम आदमी पार्टी के विधायक दिलीप पांडेय हों, ये लोगों की मदद कर रहे हैं लेकिन ये दफ्तर खोल कर नहीं बैठे हैं, जहां जाने पर लोगों को दवा और इलाज मिल रहा है।

इसके उलट भाजपा के नेता दवा बांटने के लिए दफ्तर खोल कर बैठ जा रहे हैं? पूर्वी दिल्ली के भाजपा सांसद गौतम गंभीर क्रिकेट के आईपीएल तमाशे में विशेषज्ञ के तौर पर कमेंटरी कर रहे थे। अचानक उनकी नींद खुली तो उन्होंने ऐलान किया कि दिल्ली में किसी को फैबिफ्लू दवा की जरूरत हो तो वह उनके कार्यालय से ले जाए। सोचें, जब दवा दुकानों में दवा की कमी हो रही है तो उसे कार्यालय में रख कर बांटने का इसके सिवा क्या तर्क है कि आपको राजनीति करनी है? इसी तरह गुजरात भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष पार्टी कार्यालय में बैठ कर रेमडेसिविर के इंजेक्शन बांट रहे थे। सोचें, जिस इंजेक्शन की पूरे देश में कमी है वह अस्पतालों में होनी चाहिए या पार्टी कार्यालय में?

मुंबई में भी विले पार्ले पुलिस स्टेशन में आधी रात को देवेंद्र फड़नवीस और प्रवीण  दारेकर ने जो विवाद खड़ा किया और रेमडेसिविर इंजेक्शन का उत्पादन करने वाली कंपनी ब्रक फार्मा से जुड़े एक व्यक्ति के लिए ही था। कहा जा रहा है कि भाजपा के नेता अपने दफ्तर में बैठ कर इंजेक्शन बांटने के लिए उसका भंडारण करना चाहते थे पर मुंबई पुलिस ने पहले ही फार्मा कंपनी वाले को हिरासत में लेकर खेल बिगाड़ दिया।

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