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कन्हैया की क्या राजनीति?

जवाहर लाल नेहरू यूनिवर्सिटी छात्र संघ के पूर्व अध्यक्ष और सीपीआई के सचिव कन्हैया कुमार की क्या राजनीति है? बिहार में लोकसभा का चुनाव लड़ने और हारने के बाद से लगता है कि वे तय नहीं कर पा रहे हैं कि उनको क्या करना है। देश इस समय बुरी तरह से आंदोलित है। करीब तीन महीने से किसानों का आंदोलन चल रहा है और उससे जुड़ी कई घटनाएं हो रही हैं, जिनमें उनके जैसे युवा और मुखर नेता के लिए आगे आकर कमान संभालने का मौका था। लेकिन वे परदे के पीछे रहे। सोशल मीडिया में किसान आंदोलन का जरूर समर्थन किया पर जमीन पर उतर कर आंदोलन को मजबूती नहीं दी। अब खबर है कि वे बिहार में अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षा पूरा करने के प्रयास में लग गए हैं। इसके साथ ही उनकी यह कोशिश भी है कि किसी तरह से देशद्रोह के मुकदमों से मुक्ति मिले।

गौरतलब है कि दिल्ली में उनके खिलाफ देशद्रोह का मुकदमा चलाने की मंजूरी दे दी गई है। सो, अब पांच साल पुराने मामले में ट्रायल शुरू होने वाला है। इसी बीच कन्हैया कुमार ने बिहार में सत्तारूढ़ गठबंधन में शामिल जनता दल यू के साथ करीबी बढ़ानी शुरू कर दी है। उन्होंने बिहार सरकार के मंत्री और प्रदेश जदयू के कार्यकारी अध्यक्ष रहे अशोक चौधरी से मुलाकात की। हालांकि इसे शिष्टाचार मुलाकात बताया जा रहा है लेकिन रोचक बात है कि सोमवार को जिस दिन कन्हैया और अशोक चौधरी की मुलाकात हुई उसी दिन सीपीआई की सहयोगी राजद के नेता श्याम रजक सीपीआई कार्यालय गए थे कन्हैया से मिलने। लेकिन उनकी कन्हैया से मुलाकात नहीं हुई। यानी कन्हैया अपनी सहयोगी पार्टी के नेता नहीं मिले और विरोधी पार्टी के नेता से उनके घर जाकर मुलाकात की।

ध्यान रहे जदयू और सीपीआई पहले साथ रहे हैं। 2014 में जब नीतीश कुमार एनडीए से अलग हुए थे तब उन्होंने सीपीआई के साथ मिल कर लोकसभा का चुनाव लड़ा था। जनवरी 2016 में जब जेएनयू में विवाद हुआ और कन्हैया के साथ कई छात्र नेताओं को देशद्रोह के मामले में गिरफ्तार किया गया तो नीतीश कुमार और उनकी पार्टी ने छात्रों का साथ दिया था। इस बैकग्राउंड के अलावा ताजा खबर यह है कि सीपीआई के विधायक जदयू में जाने की तैयारी में हैं। ऐसे समय में कन्हैया का अशोक चौधरी से मिलना किसी बड़े राजनीतिक घटनाक्रम का इशारा है। यह कोई शिष्टाचार मुलाकात नहीं थी, बल्कि विशुद्ध राजनीतिक मुलाकात थी।

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