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एनडीए के सहयोगी अब हैं कहां?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शनिवार को एनडीए की सहयोगी पार्टियों की बैठक बुलाई थी। संसद के हर सत्र में यह एक औपचारिकता होती है कि सरकार सर्वदलीय बैठक बुलाती है और भाजपा-कांग्रेस अपने-अपने सहोयोगी दलों की बैठक बुलाते हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भाजपा की सहयोगी पार्टियों से कहा कि वे लोगों के बीच जाएं और केंद्र सरकार के बनाए तीन कृषि कानूनों के फायदे समझाएं। उनकी सहयोगी पार्टियों ने बात सुनी और अपने अपने घर गए। अव्वल तो भाजपा के पास अब सहयोगी बचे नहीं हैं और जो बचे हैं उनमें से कोई भी कृषि कानूनों का सार्वजनिक रूप से बचाव करने को तैयार नहीं है।

भाजपा के नेता जरूर पार्टी अनुशासन की मजबूरी में कृषि कानूनों के फायदे समझा रहे हैं पर उनमें से भी ज्यादातर को कानून के बारे में विस्तार से पता नहीं है। बहरहाल, भाजपा के पास अब बहुत कम सहयोगी बचे हैं। पिछले करीब दो साल में उसकी ज्यादातर बड़ी सहयोगी पार्टियां साथ छोड़ कर जा चुकी हैं। टीडीपी, शिव सेना, अकाली दल, राष्ट्रीय लोक समता पार्टी जैसी कई पार्टियां अलग हो गई हैं। खृषि कानूनों के मसले पर भाजपा के सहयोगी सांसद हनुमान बेनीवाल एनडीए से अलग हुए। सो, ले-देकर भाजपा के पास एक बड़ी सहयोगी पार्टी जनता दल यू है और दूसरी लोक जनशक्ति पार्टी है। उसमें भी जनता दल यू और लोक जनशक्ति पार्टी में ऐसा झगड़ा मचा हुआ है कि लोजपा नेता चिराग पासवान को एनडीए की बैठक में बुलाने में जदयू ने ऐसा विरोध किया कि बेचारे पासवान सेहत का हवाला देकर बैठक में शामिल नहीं हुए। इसके अलावा असम गण परिषद या आरपीआई, जजपा, अन्ना डीएमके जैसी एक-एक, दो-दो सांसदों वाली दो-चार पार्टियां एनडीए में हैं।

इनमें भी जजपा को हरियाणा की राजनीति में इतना नुकसान हो रहा है कि उसके नेता भाजपा सरार में शामिल होने के बावजूद किसान आंदोलन का समर्थन करने लगे हैं। बिहार की दोनों पार्टियों जदयू और लोजपा के नेता चुप लगाए हुए हैं। एनडीए के ज्यादातर सहयोगी मान रहे हैं कि कृषि कानूनों के फायदे समझाने का मतलब किसानों के आंदोलन का विरोध करना है। वे अभी किसान आंदोलन का विरोध करने की जोखिम नहीं लेना चाहते हैं। इसलिए भले प्रधानमंत्री मोदी ने एनडीए के घटक दलों से कृषि कानूनों के फायदे समझाने की अपील की है पर हकीकत में भाजपा के अलावा कोई दूसरी पार्टी इन कानूनों के समर्थन में बोलने को तैयार नहीं है।

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