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राम माधव कहां चले गए?

संघ के पूर्व प्रवक्ता और भाजपा के पूर्व महासचिव राम माधव का इन दिनों अता-पता नहीं है। जम्मू कश्मीर में जिला विकास परिषद यानी डीडीसी के चुनावों के नतीजे आने के कई दिन बाद सोमवार को उन्होंने अंग्रेजी के एक अखबार में इस बारे लेख लिखा कि इन चुनावों से पता चलता है कि जम्मू कश्मीर के लोग बेहतर शासन के लिए लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण की प्रक्रिया में शामिल हो रहे हैं। लेकिन लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण के लिए चली लंबी चुनावी प्रक्रिया में खुद राम माधव कहीं नहीं दिखे।

भाजपा में उनको जम्मू कश्मीर और पूर्वोत्तर का विशेषज्ञ को माना ही जाता है वे प्रभारी के तौर पर भी काम रहे थे। लेकिन भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जगत प्रकाश नड्डा की टीम में जगह नहीं मिलने के बाद वे एकदम तस्वीर से गायब हो गए। जम्मू कश्मीर में चुनाव की प्रक्रिया एक महीने से ज्यादा चली, लेकिन राम माधव की कोई भूमिका नहीं दिखी। भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता सैयद शाहनवाज हुसैन एक महीने तक वहां कैंप किए रहे और केंद्रीय मंत्रियों में स्मृति ईरानी और अनुराग ठाकुर ने खूब सभाएं कीं। यह सही है कि राम माधव अब पार्टी के महासचिव या प्रभारी नहीं हैं पर इतने बरसों तक उन्होंने जम्मू कश्मीर में जो काम किया है उसका लाभ तो पार्टी को लेना चाहिए था या उन्हें अपनी सेवाएं देनी चाहिए थी!

इसी तरह केंद्र में भाजपा की सरकार बनने के बाद से ही राम माधव पूर्वोत्तर में काफी सक्रिय रहे और हर घटनाक्रम के केंद्र में रहे। लेकिन वे अचानक वहां की राजनीति से भी गायब हो गए हैं। असम में बोडोलैंड क्षेत्रीय परिषद का चुनाव हुआ, भाजपा का बोडोलैंड पीपुल्स फ्रंट से तालमेल खत्म हुआ, भाजपा ने वहां नया तालमेल बनाया और चुनाव के बाद भाजपा गठबंधन को ही बीटीसी की कमान भी मिली पर इस पूरी प्रक्रिया में हिमंता बिस्वा सरमा और सर्बानंद सोनोवाल की सब कुछ संभालते दिखे। असम में नए सिरे से सीएए के खिलाफ आंदोलन शुरू हुआ है और अरुणाचल प्रदेश में भाजपा ने अपनी सहयोगी जदयू को तोड़ कर उसके छह विधायक अपने साथ लिए कर लिए। इस पूरी प्रक्रिया में भी राम माधव नहीं दिखे।

कहीं ऐसा तो नहीं है कि पार्टी के अंदर किसी गुटबाजी का शिकार हो गए? या उनके बारे में उड़ने वाली अफवाहों को पार्टी ने गंभीरता से ले लिया? करीब छह साल तक वे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के करीबी के रूप में जाने जाते रहे। कश्मीर और पूर्वोत्तर का काम संभालते रहे। प्रधानमंत्री के अघोषित शेरपा के तौर पर उनकी विदेश यात्राओं में बड़े कार्यक्रमों का आयोजन करते रहे। इसके बावजूद राज्यसभा भी नहीं जा सके, जबकि अमित शाह के अध्यक्ष रहते उनकी टीम के बाकी सारे महासचिव किसी न किसी सदन के सदस्य थे। एक कैलाश विजयवर्गीय को छोड़ कर, बाकी सारे राज्यसभा सांसद थे। राम माधव को सांसदी नहीं मिली, केंद्र में मंत्री नहीं बन पाए और अब अपनी विशेषज्ञता वाले इलाकों में पार्टी की राजनीति से दूर हो गए हैं। अमित शाह की टीम में रहते उन्हें सांसदी नहीं मिली और नड्डा की टीम में जगह भी नहीं मिली। यह देखना दिलचस्प होगा कि उनका पुनर्वास कब तक होता है।

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