ओवैसी को मुख्य विपक्ष कौन बना रहा है?

ऐसा लग रहा है कि असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी ऑल इंडिया एमआईएम देश में मुख्य विपक्षी पार्टी बन रही है। अगर मुख्य विपक्षी नहीं तो कम से कम भाजपा की सबसे बड़ी विरोधी पार्टी के तौर पर उभर रही है। यह सही है कि कांग्रेस नेता राहुल गांधी भाजपा के ऊपर लगातार हमलावर हैं और वे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भी निशाना बना रहे हैं। पर एक पार्टी के तौर पर कांग्रेस का आधार सिमट रहा है। भाजपा और दूसरी क्षेत्रीय पार्टियों ने कांग्रेस का जो वोट बैंक अपना बना लिया है उसे राहुल वापस नहीं हासिल कर पा रहे हैं। इसके अलावा उनका मोदी विरोधी किसी नए वोट बैंक के बीच लोकप्रिय नहीं बना रहा है। लेकिन इससे उलट ओवैसी की मोदी विरोध उनको मुस्लिम समाज में हीरो बना रहा है। सिर्फ युवा नहीं, बल्कि व्यापक मुस्लिम समाज उनको पसंद करने लगा है और वोट देने लगा है।

पिछले छह साल में ओवैसी की पार्टी की ताकत बड़ी तेजी से बढ़ी है। भाजपा के अलावा देश की इकलौती पार्टी एमआईएम है, जिसका विस्तार हुआ है, जिसने नए राज्यों में अपना खाता खोला है। कभी सिर्फ एक शहर हैदराबाद की पार्टी रही एमआईएम आज चार राज्यों में अपना खाता खोल चुकी है। 2014 में नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने से पहले एमआईएम का आधार सिर्फ हैदराबाद में थे और उसने महाराष्ट्र के औरंगाबाद नगर निगम चुनाव में कुछ सीटें जीती थीं। लेकिन अब हैदराबाद के अलावा औरंगाबाद से भी उसका सांसद हैं। तेलंगाना विधानसभा के अलावा महाराष्ट्र और बिहार विधानसभा में उसके सदस्य हैं। महाराष्ट्र में दो और बिहार में पांच  विधायक एमआईएम के हैं। कर्नाटक में भी उसने नगर निगम का चुनाव जीता है और अब ओवैसी की पार्टी पश्चिम बंगाल और उत्तर प्रदेश में चुनाव लड़ने की तैयारी कर रही है।

सवाल है कि अचानक छह साल में ऐसा क्या होगा कि जिस पार्टी की हैदराबाद के बाहर कोई पूछ नहीं थी वह देश भर में राजनीति करने लगी? इसका जवाब हैदराबाद नगर निगम के चुनाव में भाजपा नेताओं- अमित शाह, जेपी नड्डा और योगी आदित्यनाथ के प्रचार में है। इन नेताओं ने प्रचार में मुख्यमंत्री चंद्रशेखर राव से ज्यादा हमला ओवैसी पर किया। असल में भाजपा ने ओवैसी की पार्टी को आक्रामक ध्रुवीकरण का माध्यम बना लिया है। इसका फायदा भाजपा को है तो ओवैसी को भी है।

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