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लोजपा का नेता कौन- चिराग या पारस?

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बिहार में अब रामविलास पासवान की विरासत की जंग शुरू हो गई है। रामविलास की बनाई लोक जनशक्ति पार्टी का नेता कौन होगा? पार्टी मुख्यालय और उसके फंड को कौन नियंत्रित करेगा? और सबसे बड़ी बात यह है कि बिहार का पांच फीसदी दुसाध वोट किसके साथ जाएगा? अभी पहले दौर की राजनीति देखें तो ऐसा लग रहा है कि पशुपति पारस ने अपने भतीजे चिराग पासवान को पटखनी दे दी है क्योंकि उनके साथ पांच सांसद हैं और पार्टी के प्रदेश कार्यालय पर अभी उनका नियंत्रण है। चूंकि लोजपा के पास एक भी एमएलए या एमएलसी नहीं है। उसकी कुल पूंजी छह सांसदों की थी, जिसमें से पांच पशुपति पारस के साथ चले गए हैं। इसके अलावा एक बड़ी पूंजी पांच फीसदी पासवान वोट की है। इसके साथ कुछ सवर्ण भी रामविलास पासवान के साथ हमेशा जुड़े रहे थे।

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अब असली लड़ाई उस वोट बैंक की है। बिहार में या देश के दूसरे हिस्सों में भी प्रादेशिक पार्टियों के राजनीतिक उत्तराधिकार की बात आती है तो आमतौर पर वह सुप्रीम नेता के बेटे-बेटी को ही ट्रासंफर होती है। इस लिहाज से रामविलास पासवान के उत्तराधिकारी उनके बेटे चिराग पासवान ही होंगे। भले अभी पशुपति पारस के साथ सांसद हैं या ऐसा लग रहा है कि उन्होंने जंग जीत ली है लेकिन अंतिम रूप से विजेता चिराग ही होंगे। यह भी कहा जा रहा है कि अंत में कम से कम एक सांसद और चिराग के चचेरे भाई प्रिंस राज जरूर उनके साथ लौटेंगे।

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ध्यान रहे प्रिंस की मां और पशुपति पारस की पत्नी सगी बहनें हैं इस घरेलू दबाव की वजह से फिलहाल वे पारस के साथ गए हैं पर चुनाव से पहले उनके लिए लोजपा में लौटना मजबूरी हो जाएगी। दूसरी ओर पार्टी संगठन के ज्यादातर लोग अब भी चिराग के साथ हैं। दूसरे, पार्टी पर नेतृत्व का चुनाव आयोग का फैसला सांसदों की संख्या की बजाय इस आधार पर होगा कि पार्टी के जिला अध्यक्ष, प्रदेश अध्यक्ष और प्रदेश कार्यकारिणी और राष्ट्रीय कार्यकारिणी के कितने सदस्य किसके साथ हैं। इस लिहाज से भी चिराग का पलड़ा भारी लग रहा है। 

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