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मूंछ की लड़ाई में हारे दाढ़ी वाले!

राज्यसभा की एक सीट हथियाने के लिए सत्तारूढ भाजपा इतनी ज्यादा हाय तौबा मचाएगी और अंततः हारेगी इसकी किसी ने कल्पना नहीं की थी। गुजरात में जो कुछ हुआ उसे देखकर बचपन के वह कटाक्ष याद आ गया जब क्रिकेट खेल रहे बच्चों को परेशान करने के लिए कुछ मवाली किस्म के बड़े लड़के उनका बल्ला व गेंद छीन कर चल पड़ते थे तो वे अपना ही सामान हासिल करने के लिए उनकी अनुनय विनय करते नजर आते थे। मवाली शब्द सुनने में भले ही बुरा लगता हो मगर गुजरात में राज्यसभा चुनाव के दौरान जो कुछ हुआ उससे ज्यादा बड़ा राजनीतिक मवालीकरण कुछ और नहीं हो सकता है।

यह जानते हुए भी कि भाजपा वहां से तीसरी जीत हासिल करने की स्थिति में नहीं है। वहां बलवंत सिंह राजपूत का पर्चा भरवाया गया ताकि सोनिया गांधी के राजनीतिक सचिव व पार्टी में उनके बाद दूसरे सबसे शक्तिशाली नेता को हरा कर पूरे देश में कांग्रेंस के खिलाफ संदेश दिया जा सके। भाजपा के लिए उनका हारना इसलिए जरूरी था ताकि देश भर में दलबदल के जरिए उस पार्टी को और कमजोर बनाया जा सके। इसका सीधा असर इस साल के अंत में होने वाले गुजरात विधानसभा चुनाव पर भी पड़ता।

हालांकि मेरी समझ में यह बात नहीं आती है कि जिस राज्य के देश में प्रधानमंत्री व भाजपा अध्यक्ष हो, वहां यह पार्टी अपनो को लेकर इतनी चिंतित क्यों दिखाई दे रही है? सच कहा जाए तो यह मूंछो की लड़ाई थी। एक तरफ अमित शाह व नरेंद्र मोदी सरीखे दो दाढ़ी वाले नेता थे तो दूसरी ओर उनके मुकाबले में एक ऐसे मौलाना थे जिनकी दाढ़ी तो दूर रही, मूंछे तक नहीं थी। फिर भी चैनलों पर इसे दो चाणक्यो- अमित शाह व अहमद पटेल की लड़ाई के रूप में पेश किया जा रहा था।

इस एक सीट को लेकर केंद्र व राज्य की भाजपा सरकारें कितनी परेशान थी इसका पता तो केंद्रीय कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद समेत आधा दर्जन मंत्रियों के चुनाव आयोग पहुंच जाने से चलता है। मालूम हो कि चुनाव आयोग, कानून मंत्रालय के दायरे में  है। मगर वहां कानून मंत्री खुद पहुंच जाता है और बेहयाई से कहता है कि वह तो भाजपा नेता की हैसियत से आया है। ठीक वैसा ही मामला है जैसे वर्णिका कुंडू के मामले में मुख्यमंत्री खट्टर थाने पर पहुंच कर कहे कि वे तो भाजपा नेता की हैसियत से आए हैं।

उधर गांधी नगर में मुख्यमंत्री व अमित शाह देर रात तक विधानसभा में डेरा डाले रहे। अपने सूत्र बताते है कि असली दिक्कत तब आई जबकि गुजरात विधानसभा के रिटर्निग अफसर अड़ गए। वरना तैयारी यह थी कि इस मामले को सुबह तक टाला जाए। सुबह होते ही गुजरात हाईकोर्ट से इस चुनाव नतीजे पर रोक लगाने के लिए स्टे ले लिया जाए और फिर मामला लटका रहता। भले ही नतीजा घोषित कराने में गुजरात विधानसभा के कुछ अफसरो की भूमिका रही हो मगर इस कदम ने चुनाव आयोग की इज्जत बचा ली और आज चैनलों पर तमाम वक्ता उसे उसकी इस निष्पक्षता के लिए बधाई दे रहे हैं।

भाजपा ने पहले कांग्रेस के विधायक तोड़े और फिर बचे खुचे विधायकों को भी बरगलाने की कोशिश की। यहां कांग्रेंस के पक्ष में इतनी बात जरूर जाती है कि उसने हरियाणा की घटनाओं से सबक लिया। जिस तरह वहां हुए राज्यसभा चुनाव में कांग्रेस के अधिकारिक उम्मीदवार आरके आनंद जी चैनल के मालिक सुभाष गोयल से इसलिए भी हारे थे क्योंकि जाने माने वकील व कांग्रेस के प्रवक्ता रणदीप सिंह सुरजेवाला ने वोट डालने के समय बैलेट पेपर को भी दिखा दिया था जिन्हें कि इसे नहीं दिखाना जाना चाहिए था।

गुजरात में कांग्रेस ने इसी बात का लाभ उठाया। हालात को अपने हिसाब से मोड़ा। वैसे सच तो यह है कि नरेंद्र मोदी और अमित शाह ही नहीं बल्कि कांग्रेस में नेताओं का एक बड़ा वर्ग अहमद पटेल के हारने के लिए प्रार्थना कर रहा था क्योंकि वे उनके प्रमुख व सोनिया गांधी से उनकी नजदीकियों को लेकर प्रसन्न नहीं थे। जयराम रमेश ने तो यहां तक कह दिया कि कुछ लोग सुल्तान की तरह बर्ताव करते है इसलिए कांग्रेस की यह बर्बादी हो रही है।

अहमद पटेल सोनिया गांधी के सबसे ज्यादा विश्वासपात्र लोगों में गिने जाते हैं। सच्चाई यह है कि उन्होंने 40 साल बाद फिर इतिहास रचा है। उन्होंने 1977 में पहली बार भड़ूच से लोकसभा का चुनाव लड़ा था जबकि पूरे देश में इंदिरा गांधी व कांग्रेस के विरोध की आंधी चल रही थी। वे काफी अंतर से यह चुनाव जीते व लगातार दो बार लोकसभा में पहुंचे उसके बाद उन्होंने राज्यसभा में आना शुरू किया। वे राजीव गांधी के काफी करीब थे व उन्होंने उन्हें प्रधानमंत्री रहते हुए अपना संसदीय सचिव बनाया था। उनके न रहने के बाद वे सोनिया गांधी के करीबी लोगों में गिने जाने लगे। हालांकि बीच में पीवी नरसिंहराव का काल भी आया जब कि उन्हें देश की राजनीति व सत्ता से अलग-थलग रखा गया।

जब मनमोहनसिंह सरकार बनी तो वे सबसे ज्यादा शक्तिशाली नेता माने जाने लगे। सोनिया गांधी उनके जरिए ही प्रधानमंत्री व सरकार तक अपने संदेश पहुंचाती थी। मंत्री से लेकर राज्यपाल तक देश के तमाम अंहम पदों पर होने वाली नियुक्तियों में अहमद पटेल की भूमिका रहा करती थी। प्रधानमंत्री निवास भले ही 7-रेसकोर्स रोड़ रहा हो मगर सत्ता का असली केंद्र 20 विलिंगडन क्रीसेट ही था। मगर समय का फेर देखिए कि जो अहमद पटेल अपने दुश्मनों और विरोधियों तक के काम करवाने में व उन्हें खुश रखने में आस्था रखते थे उन्हें उनके ही विश्वासपात्र बलवंत सिंह राजपूत ने धोखा दिया। बलवंत सिंह राजपूत की कभी पंसारी की दुकान हुआ करती थी। बड़ी मुश्किल से वे दो वक्त की रोटी जुटा पाते थे। जब उन पर अहमद पटेल का हाथ आया तो फिर उन्होंने पीछे मूड़ कर नही देखा। उन्हें विधानसभा का टिकट दिलवाया। पिछला विधानसभा चुनाव उन्होंने कांग्रेस के टिकट पर जीता था व उस समय अपनी कुल संपत्ति 363 करोड़ होने की घोषणा की थी। उन्होंने गुजराती शिक्षण संस्थान स्थापित किया जहां पर अहमद पटेल की तस्वीरे लगी होती थी।

बलवंत सिंह राजपूत जब कांग्रेस में थे तब कहते थे कि इंसान को न्यायप्रिय होना चाहिए व हंस की तरह बर्ताव करना चाहिए। जैसे हंस दूध में से नीर व क्षीर को अलग कर के पीता है वैसे ही इंसान का आचरण होना चाहिए। उन्होंने इसको करके भी दिखाया जब लगा कि कांग्रेस का दूध फट गया है तो तुरंत भाजपा की फुलक्रिमी दूध के पैकेट पर मुंह मार दिया।

अमित शाह भी अहमद पटेल को उनके सबसे विश्वासपात्र व्यक्ति के जरिए ही चुनौती देना चाहते थे ताकि वे मानसिक दबाव में भी रहे। बलवंत सिंह राजपूत कांग्रेंस छोड़कर जाने वाले शंकरसिंह वाघेला के बेटे के समधी भी है। वे कहा करते थे कि एक बार यक्ष ने युधिष्ठिर से पूछा कि पृथ्वी से ज्यादा भारी और आसमान से भी ज्यादा ऊंचा कौन है तो उन्होंने जवाब दिया कि मां पृथ्वी से ज्यादा भारी है व पिता आकाश से भी ज्यादा ऊंचे है। उनका कहना था कि वे इन दोनों को भगवान मानते हैं। वे तो अहमद पटेल को अपना गाडफादर कहा करते थे। उनका दावा होता था कि इन तीनों के लिए वे अपना तन-मन-धन सबकुछ नौछावर कर सकते हैं मगर अंत में उन्होंने अपने गाडफादर को ही त्याग दिया।

अहमद पटेल उर्फ बाबूभाई ने नरेंद्र मोदी को भी नमक खिलाया था मगर प्रधानमंत्री बनने के बाद मोदी नमक का कर्ज भूल गए। इसकी एक वजह गुजरात के नमक की तासीर भी हो सकती है। भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा नमक उत्पादक देश है जहां गुजरात में 75 फीसदी का उत्पादन होता है। रोम में तो नमक सैलरी (वेतन) के रूप में दिया जाता था, इसी से इसका नाम साल्ट पड़ा। मगर टाटा को नमक के असली तासीर का पता था शायद इसीलिए उन्होंने भी अपने नमक के विज्ञापन में इसके खाने वालों के नमकहलाल बने रहने का कभी दावा नहीं किया।

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