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जय शाह और समस्या परसेप्शन की!

आर्थिक खबरों में अपनी कभी भी रूचि नहीं रही। इसकी दो वजह हैं। पहली वजह यह है कि ये बेहद तकनीकी भाषा वाली होती है और इन्हें समझने के लिए बुद्धि को काफी कष्ट देना पड़ता है अतः कटहल की सब्जी की तरह मैं इन्हें छोड़ देता हूं। 

दूसरी वजह यह है कि अक्सर इन खबरों का एक आर्थिक पक्ष भी होता है। ये अक्सर प्रायोजित भी होती है। पहले के चंद पैरे पढ़ने के बाद अगर थोड़ा बहुत समझ में आ जाए तो ठीक है वरना पूरी खबर कभी नहीं पढ़ता। हाल ही में जब भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के खिलाफ वेबसाइट ‘द वायर’ ने एक खुलासा करने का दावा किया तो सरसरी निगाह से पूरी खबर पढ़ने के बाद जो कुछ समझ में आया वो यह था कि उसने कुछ ऐसा काम किया जिससे उसके नए धंधें का आकार एकदम 16 हजार गुना अधिक हो गया। 

इसे चौकाने वाली, सनसनीखेज बढोतरी बताने के साथ जो बाते बताई गई, जो कहा गया वह मेरी समझ के बाहर थे। वैसे हर गुजराती की तरह अमित शाह का परिवार भी व्यापार करता है। व्यापार में मुनाफा कमाया जाता है। यह कितना फीसदी होना चाहिए यह मुझे नहीं पता। खबर छपने के बाद भाजपा हरकत में आ गई उनके बेटे ने अपनी कंपनी का कारोबार 16,000 गुना बढ़ जाने की खबर दिखाने वाली वेबसाइट पर सौ करोड़ रुपए की अपराधिक मानहानि का मुकदमा दायर कर दिया और कॉलम लिखे जाने तक इस पोर्टल ने इस खबर को न तो हटाया था और न ही इसके लिए माफी मांगी थी।

इस रिपोर्ट में कहा गया था कि जय शाह की कंपनी घाटे में चल रही थी। मगर 2014 में नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री व अमित शाह के भाजपा अध्यक्ष बनने के बाद कंपनी के कारोबार में 16 हजार गुना का उछाला आया। जय शाह की अदालत में मानहानी याचिका में कहा गया है यह रिपोर्ट गलत है और इससे लोगों के मन में यह धारणा बन सकती है कि उन्होंने अपनी कारोबारी सफलता के लिए पिता के राजनीतिक पद का गलत इस्तेमाल किया। 

मैं खबर की विश्वसनीयता पर नहीं जाना चाहता हूं। कांग्रेंसियों के हाथ में तो मानो, ऐन दीवाली के मौके पर बम आ गया हो। कपिल सिब्बल सरीखे जाने माने वकील कांग्रेंसी नेता इस मसले पर भाजपा अध्यक्ष को घेरने की कोशिश कर रहे हैं। अगर वे चाहते तो इसमें दिए तथ्यों की पुष्टि खुद भी करवा कर कुछ और नए तथ्य सामने रख सकते थे। 

मसला कांग्रेंस या विपक्ष का नहीं है। मुझे तो सबसे ज्यादा आश्चर्य इस बात का हुआ जबकि कुछ वरिष्ठ भाजपा नेताओं ने अपनी निजी बातचीत में जो कहा वह चौंकाने वाला था। इस पार्टी में भले ही उसके नेता खुलकर अपनी बात न कह पा रहे हो मगर उन्होंने इस मामले में जो कुछ इधर-उधर कहा, दलीलें दी है, उससे इस बात का अंदाजा लगाया जा सकता है कि पार्टी के अंदर क्या चल रहा है। भाजपा को कांग्रेंस से नही बल्कि अपने नेताओं के परसेप्शन से चिंतित होना चाहिए।

एक नेता का कहना था कि हम कुछ भी दावे करते रहे मगर असली मुद्दा यह है कि आम जनता इस तरह के आरोपों को लेकर इन दिनों क्या सोचने लगी है? ऐसे हालत में हमें क्या करना चाहिए इसकी मिसाल भी हमारी पार्टी ने ही कायम की है। यह तो उस राम की पार्टी है जिसने त्रेता युग में एक धोबी द्वारा भगवान राम की पत्नी सीता पर बेहूदा आरोप लगाए जाने के बाद उन्हें घर से ही निकाल दिया था। यह उस लाल कृष्ण आडवाणी की पार्टी है जिन्होंने जैन हवाला डायरी में अपना नाम आने का आरोप लगने के बाद पद त्याग दिया था और इसकी अग्नि परीक्षा में खरे उतरने के बाद ही राजनीति में सक्रिय हुए। 

वे याद दिलाते हैं कि जब भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी की कंपनियों पर भी इस तरह के आरोप लगे थे तो हमारी ही पार्टी के कुछ बड़े नेताओं ने जो कि इस समय मोदी व शाह के सलाहकार बने हुए हैं उनका अध्यक्ष पद से इस्तीफा करवा कर ही दम लिया था। तब तो कांग्रेंसी भी यह बात मानते थे कि भाजपा व उनके दो वकील नेताओं की निकटता के चलते ही नितिन गडकरी को निपटाया गया था। कांग्रेंस ने छापे मारे। जांच हुई उसके बाद की प्रगति का कुछ पता नहीं है। 

यह नहीं भूलना चाहिए कि कांग्रेंस भी एक परिवार की और भाजपा भी संघ परिवार की पार्टी होने का दावा करने वाले हमारे नेता भूल जाते हैं कि सोनिया गांधी के दामाद राबर्ट वाड्रा पर भी इसी तरह के आरोप लगे थे। इनकी जांच भी करवाई जा रही है। पहले कांग्रेंसी इसे बदले से की गई कार्रवाई बता रहे थे और अब इस रिपोर्ट के आधार पर जय शाह व अमित शाह को कटघरे में खड़ा करने की कोशिश में जुट गए है। अपना भी यह मानना है कि अगर आप सार्वजनिक जीवन में है और आप पर कोई आरोप लगाया जाता है तो उसकी सत्यता से कहीं ज्यादा इस बात का महत्व बढ़ जाता है कि उस आरोप को लेकर आम जनता आपके बारे में क्या धारणा बनाती है? 

जब बोफोर्स कांड हुआ था तो वीपी सिंह प्रधानमंत्री बन जाने के बाद भी उसकी जांच को किसी निर्णायक मोड़ पर नहीं पहुंचा पाए थे। मगर राजीव गांधी का राजनीतिक कैरियर बर्बाद हो गया। बिना किसी तथ्य के सामने आए देश में एक बहुत बड़े वर्ग ने मान लिया था कि रिश्वत ली गई थी। ज्यादा दूर क्यों जाए। जब टूजी घोटाले के मामले में कानून मंत्री रहे दिग्गज वकील कपिल सिब्बल देश को जीरो लॉस की थ्योरी बेच रहे थे व विपक्ष का मखौल उड़ा रहे थे तो जनता चुपचाप सबकुछ सुनती रही मगर कांग्रेंस को इसकी कीमत चुकानी पड़ गई। 

जब कांग्रेंसी वाड्रा के बचाव में उतरे थे तो इन्हीं भाजपाईयों ने यह सवाल खड़ा किया था कि वे लोग किस हैसियत से अपना बचाव कर रहे हैं? अब भाजपा ने सिद्धार्थनाथ सिंह से लेकर पीयूष गोयल तक को  फील्डिंग में उतार दिया है। यहां भी समस्या धारणा या परसेप्शन की है। बहुत चर्चित कहावत है कि सीजर्स की पत्नी को संदेह से परे होना चाहिए। चलिए यह तो विदेशी कहावत है । अपने वाजपेयीजी को ही याद कर लीजिए जिन्होंने प्रधानमंत्री रहते हुए सोनिया गांधी से कहा था कि सभी बेटी, दामाद वाले है इसलिए ऐसी राजनीति नहीं की जाए जो कि कल दूसरे के लिए दिक्कत पैदा कर दें।

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  1. यह सहचर पूँजीवाद या सुहृद पूँजीवाद या क्रोनी कैपिटलिज़्म (Crony Capitalism) अर्थव्यवस्था की उस अवस्था का सूचक है जहाँ व्यापार-वाणिज्य में सफलता व्यापारी और सरकारी अधिकारियों के आपसी संबंध से तय होने लगती है। इसके तहत सरकारी तंत्र द्वारा व्यापारियों-उद्योगपतियों को कानूनी स्वीकृति (legal permits) के आवंटन में पक्ष लेकर, उन्हें सरकारी अनुदान देकर, कर संबंधी सहूलियतें देकर तथा अन्य आर्थिक अनियमितताओं के ज़रिये लाभ पहुँचाया जाता है। सार्वजनिक मानस पटल पर सहचर पूँजीवाद एक पद के तौर पर एशियाई वित्तीय संकट की व्याख्या के दौरान सामने आया।

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