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खुराफात की इंतहा

शायद सिन्हा सरनेम की यह खासियत ही है कि जिसके नाम के साथ जुड़ जाता है वे लोग हमेशा कोई-न-कोई विवाद खड़ा करके खबरों में बने रहते हैं। यह विवाद निजी भी हो सकते हैं व राजनीतिक भी। इसे संयोग ही कहा जाएगा कि इंदिरा गांधी को चुनाव में गलत तरीके अपनाने का दोषी ठहराने वाले इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज जगमोहन लाल भी सिन्हा थे। इंदिरा गांधी ने लेफ्टीनेट जनरल एलके सिन्हा की वरिष्ठता की अनदेखी करके उनकी जगह उनसे जूनियर को थल सेनाध्यक्ष बना दिया था। हालांकि इसका श्रीसिन्हा को फायदा ही मिला और वे जब तक जीवित रहे कहीं-न-कहीं के राज्यपाल बनते रहे। 

आपातकाल के दौरान अभिनेत्री विद्या सिन्हा के साथ तत्कालीन सूचना एवं प्रसारण मंत्री विद्या चरण शुक्ला ने यह कहते हुए छेड़छाड़ की थी की तुम भी विद्या और मैं भी विद्या। अभिनेता शत्रुघन सिन्हा व पूर्व वित्त मंत्री यशवंत सिन्हा भी आए दिन भाजपा में होने के बावजूद अपनी ही पार्टी व सरकार की कड़ी आलोचना करने के कारण खबरों में बने रहते हैं। हाल में उन्होंने नोटबंदी की बरसी पर वित्त मंत्री अरूण जेटली को ऐसे निशाने पर लिया कि रातोंरात वे कांग्रेंस की आंखों के तारे हो गए और यह पार्टी पी चिदंबरम व मनमोहनसिंह सरीखे अर्थशास्त्री नेताओं के रहते हुए भी गुजरात चुनाव में उनका इस्तेमाल करने की सोच रही है।  एक संघ विचारक राकेश सिन्हा भी है जोकि इन दिनों संबित पात्रा की तरह ही टीवी चैनलो पर छाए रहते हैं। उनका भारत नीति प्रतिष्ठान आए दिन हिंदुत्व की पैरवी करते हुए कुछ न कुछ नए खुलासे करता रहता है। इस संगठन की नजर लगातार उर्दू अखबारों पर बनी रहती है। समझ में नहीं आता कि इन दोनों लोगों को राज्यसभा भेजे जाने में क्यों देर की जा रही हैं।

एक अमिताभ सिन्हा भी है जोकि वकील हुआ करते थे। पहले अरूण जेटली के काफी करीबी माने जाते थे व उनके ही अशोक रोड स्थित घर पर मिला करते थे। मगर बाद में बताते है कि उनकी राजनीतिक आस्थाएं बदल गई और आजकल वे दयालसिंह कॉलेज प्रबंध समिति के अध्यक्ष हुए हैं। उन्होंने वहां रहते जो कमाल किया उसके कारण न केवल काफी चर्चा में है बल्कि उन्होंने अकाली व भाजपा के रिश्तों के बीच टकराव पैदा कर दिया है। 

पता नहीं किन अज्ञात कारणों से उनकी अध्यक्षता वाली प्रबंध समिति ने कॉलेज का नाम बदल कर वंदेमातरम कॉलेज करने का फैसला किया। अपना मानना है कि संभवतः ऐसा करने की वजह उनकी यह सोच रही होगी कि दयालसिंह तो कांग्रेंसी थे। यह सच है कि कांग्रेंस के गठन में उनकी अहम भूमिका रही थी मगर जब कांग्रेंस तब पार्टी न होकर देश की आजादी के लिए छेड़ा गया एक आंदोलन थी। दयालसिंह ने ही लाहौर कांग्रेंस का पूरा प्रबंध करवाया था। उन्होंने अपने भवनों में कांग्रेंसी प्रतिनिधियों को बैठाने की व्यवस्था तक की थी। काश यह कदम उठाने के पहले उन्होंने अपने ही दल के सहयोगी संगठन राष्ट्रीय सिख संगत से पूछा होता। कभी अरूण जेटली के चेले रहे पूर्व विधायक आरपी सिंह से ही इस बारे में पूछ लिया होता। 

उनके इस कदम पर उनकी अपनी ही पार्टी में कड़ी प्रतिक्रिया हुई है। हाल ही में भाजपा के चुनाव चिन्ह पर दिल्ली विधानसभा का उपचुनाव जीते मनजिंदर सिंह सिरसा व दिल्ली गुरुद्वारा प्रबंध समिति ने तो उनके इस कदम के खिलाफ आंदोलन तक छेड़ने की धमकी दे डाली है। उनके इस कदम से भाजपा व अकाली दल के संबंधों में भी दरार पड़नी तय मानी जा रही हैं। क्योंकि भाजपा के करीबी रहे ज्ञानी जैल सिंह के प्रचार सचिव व अल्पसंख्यक आयोग के पूर्व अध्यक्ष तरलोचन सिंह भी सिरसा के साथ आ खड़े हुए हैं व अमिताभ सिन्हा के इस कदम को वापस लिए जाने की मांग कर रहे हैं। 

अपना मानना है कि यह कदम उठाने के पहले सिन्हा को दयाल सिंह मजीठिया के बारे में जानकारी हासिल कर लेनी चाहिए थी। उनके पिता जनरल लेहना सिंह, महाराजा रंजीत सिंह के आठ प्रमुख सिपहसालारों में से एक थे। वे उनके गोला बारूद भंडार के प्रभारी हुआ करते थे। वे काफी पैसे वाले व्यक्ति थे। मूलतः वे अपना सरनेम गिल या शेरगिल लिखते थे। महाराजा रंजीत सिंह के न रहने के बाद जब उनका राज बिखरने लगा तो लेहना सिंह भी विरोधियों के राडार पर आ गए। ऐसे में उन लोगों से बचने के लिए वे देश भ्रमण पर निकल गए।

उनके साथ 1200 लोगों की फौज थी। अंततः वे वाराणसी में जाकर बस गए। जहां 1848 में दयाल सिंह का जन्म हुआ। चूंकि पंजाब के तमाम रजवाड़ो व रियासतों ने अंग्रेंजो का साथ दिया था अतः अंग्रेंजो ने उनकी संपत्ति व जमीनें वापस दिलवाई और दयाल सिंह पंजाब वापस लौट गए। उन्होंने निर्माण क्षेत्र में दिलचस्पी दिखाई और उस समय लाखों कमाए। उन्होंने सेना की पुरानी बैरको को खरीद कर लाहौर में वकीलों के लिए चैंबर बनवाए। वे हीरे जवाहरात का धंधा करने लगे और राजपरिवारों को इन्हें बेचकर उन्होंने काफी पैसा कमाया।  उनकी आर्थिक हैसियत का अनुमान तो इससे लगाया जा सकता है कि 1893 में दोराबजी टाटा की कुल संपत्ति 23 लाख रुपए थी जबकि 1895 में दयाल सिंह ने अपनी कुल संपत्ति 30 लाख घोषित की थी। वे शराब सिगरेट से दूर रहते थे मगर खाने और मनोरंजन के शौकीन थे। वे घंटों खाना खाते। उन्होंने अपने यहां मुसलमानों, विदेशियों, हिंदुओं की मनपसंद का खाना बनाने के लिए अलग धर्म के रसोईए रखे हुए थे। 

उन्होंने 1881 में लाहौर से ट्रिब्यून अखबार निकाला जोकि शुरू में साप्ताहिक था। उनका मानना था कि भारतीयो को आगे बढ़ाने के लिए उनका शिक्षित होना जरूरी है। उन्होंने 9 कॉलेज व तीन पुस्तकालय स्थापित किए। इनमें से एक आईटीओ पर स्थित है जहां द ट्रिब्यून अखबार का दफ्तर है। कांग्रेंस के लाल बाल पाल केसी बिपिन चंद्र पाल उनके अखबार में उपसंपादक हुआ करते थे। 

वे खुद ब्रह्म समाज से जुड़े हुए थे। उनकी दो पत्नियां थी भगवान कौर व लिली कैथरीन। भगवान कौर से उनकी बनती नहीं थी व वे उनसे अलग ही रहती थी। भगवान के पहले दयाल सिंह ने अपनी पूरी संपत्ति का ट्रस्ट बना डाला व उसके ट्रस्टी अपने कुछ वकील मित्र बना दिए। उनके इस फैसले को उनकी दोनों बीवियो ने प्रिवी काउंसिल में चुनौती दी मगर फैसला उनके हक में नहीं हुआ। वे भगवान कौर को सौ रुपए महीना देते व कैथरीन के लिए 20,000 रुपए छोड़ गए थे। करोड़ों की संपत्ति उन्होंने कॉलेजो, लाइब्रेरी व ट्रिब्यून के लिए दे दी। दयाल सिंह कॉलेज दिल्ली विश्वविद्यालय का पहला सांध्य कालीन कॉलेज था व इसकी जमीन उनके ट्रस्ट ने ही खरीदी। यहां यह ध्यान देना जरूरी हो जाता है कि विभाजन के बाद से लाहौर स्थित दयाल सिंह कॉलेज व लाइब्रेरी का आज तक नाम नहीं बदला गया मगर भाजपा के शासन में उनका नाम मिटाने की कार्रवाई की जा रही है। बैठे ठाले भाजपा व सिखों के बीच टकराव शुरू हो गया है। इसे कहते हैं कि आ बैल मुझे मार।

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