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राज्यमंत्री पद या हड्डी?

विवेक सक्सेना
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काफी पहले की बात है तब मैं दिल्ली प्रेस में था। हमारे संपादक मालिक काफी तेज तर्रार थे। एक दिन वे मेरे पास बैठे एक टाइपिस्ट के पास आए जो कि ज्यादातर अपना समय लेख टाइप करने की जगह इधर-उधर देखने में लगाता था। उन्होंने तेज आवाज से कहा कि मैं तुम्हारी जगह बदल रहा हूं कल से तुम सामने वाले केबिन में बैठोगे क्योंकि मैंने तुम्हे प्रमोट करके टाइपिस्ट की जगह सुपरवाइजर बना दिया है। इसकी वजह यह है कि तुम अपना काम तो नहीं करते हो मगर दूसरे लोग क्या करते हैं, यह पूरा दिन देखते रहते हो। 

वह बुरी तरह से झेंप गया व अगले दिन से उसने दफ्तर आना बंद कर दिया। जब हाल ही में मध्य प्रदेश सरकार द्वारा पांच धर्मगुरुओं को राज्य मंत्री का दर्जा देने की खबर पढ़ी तो मुझे वह घटना याद आ गई। जो काम उन्होंने दशको पहले किया था, वही काम मुख्यमंत्री आज कर रहे हैं। 

वहां हुआ यह कि राज्य के इन लोगों ने यह ऐलान किया था कि वे सरकार के भ्रष्टाचार व राज्य में जारी गोहत्या के खिलाफ 1 अप्रैल से इंदौर से अपनी पदयात्रा शुरू करेंगे। जिसमें नर्मदा के किनारे पौधे लगाने का विश्व रिकार्ड स्थापित करने का दावा करने वाली घटनाओं का खुलासा किया जाएगा। 

इस घटना के पहले 31 मई को अचानक मुख्यमंत्री कार्यालय ने भोपाल स्थित अपने दफ्तर में उनकी बैठक बुलाई और वृक्षारोपण, पर्यावरण व नदी की स्वच्छता सरीखे मामलों के लिए एक समिति बना कर इन पांचों लोगों को उसमें मनोनित कर दिया। अब यह भी जान लिया जाए कि एक राज्य मंत्री की हैसियत हासिल करने वाले को क्या मिलता है? उन्हें सरकारी गाड़ी, डीजल, आवास भत्ता, बिजली, निजी स्टाफ के लिए हर महीने 15,000 रुपए व अपने लिए 20,000  रुपए माह का मानद भत्ता मिलता है। 

इसके अलावा उन्हें सुरक्षा के लिए उनकी हैसियत के हिसाब से पुलिस वाले मिल जाते हैं। जिन बाबाओं का सरकार पर प्रभाव काफी ज्यादा होता है वे उसकी कृपा से एनएसजी के ब्लैक कैट कमांडो की सुरक्षा हासिल कर लेते हैं जोकि उनकी व उनके धंधे की हैसियत बढ़ाती है। मालूम हो कि यह हैसियत पाने वाले बाबाओं में नामदेव त्यागी उर्फ कंप्यूटर बाबा, भय्यूजी महाराज उर्फ उदयसिंह देशमुख यात्रा के संयोजक पंडित योगेंद्र महंत आदि शामिल है जो कि कांग्रेंस से जुड़े हुए हैं। 

इस देश की राजनीति में सदा ही बाबाओं की अहमियत रही है। इंदिरा गांधी को देवरहा बाबा, धीरेंद्र ब्रह्मचारी बहुत पसंद थे तो उनके पिता जवाहरलाल नेहरू मां आनंदमयी के काफी करीब थे। जब अर्जुनसिंह मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री थे तो उन्होंने संचार मंत्री की हैसियत से अपने कोटे से राज्य के 'मौनी बाबा' को टेलीफोन सलाहकार समिति का सदस्य मनोनित करके उन्हें करीब हजार मुफ्त कालो वाला एक सरकारी फोन भेंट कर दिया था। उनकी इस हरकत से नाराज एक दिलजले पत्रकार ने अपने अखबार में खबर लगाई थी कि गूंगा बोलता तो है नहीं फोन का क्या करेगा। इस घटना की काफी दिनों तक चर्चा होती रही। 

जब खुद को भगवान घोषित करके उत्तराखंड के नेता सतपाल जी महाराज केंद्रीय मंत्रिमंडल में शामिल हुए तो मैंने इस बारे में लिखी खबर का हैडिंग बनाया था कि भगवान से राज्य मंत्री बने सतपालजी! शायद सरकार व उसके द्वारा दी जाने वाली सुविधाओं की यह खूबी है कि लाखों भक्तों के बीच पूजा जाने के बावजूद सरकार की टुच्ची सुविधाएं हासिल करने के लिए इतना लालयित हो जाता है। इन बाबाओं में से एक तो पीडब्ल्यूडी में ठेकेदारी करते हैं। उन्होंने रेलवे से विकलांगों को दिया जाने वाला सस्ता पास भी हासिल कर लिया था। उन्होंने दावा किया था कि उनके आंखों की रोशनी जा चुकी है। जब इसका खुलासा हुआ तो उन्होंने बताया कि पूजा पाठ के कारण उनकी रोशनी वापस आ गई है। 

हर मंत्री सेठ, लाला या पैसे वालो का कोई न कोई बाबा होता है। एक ऐसा ही नाम पायलट बाबा का था जिन्होंने एक हिंदी समाचार एजेंसी के प्रमुख को अपना चेला बना रखा था। जब वे अपने जुनियर पत्रकारों को लेकर उनके चरण में बैठ गए तो मैंने कुछ तीखे सवाल किए जिसमें बाबा व संपादक दोनों ही काफी चिढ़ गए। भजनलाल ने तो मुख्यमंत्री बनने के लिए हरियाणा भवन में एक बाबा से खास पूजा करवाई थी। मैंने उसकी तारीफ कर उसकी दुकान जमाने का भरोसा देकर उसकी तस्वीर खींच ली थी। जिसके अखबार में छपने के बाद उसे वहां से भगा दिया गया। 

ऐसे ही एक सदाचारी बाबा थे। जिसको एक महिला की हत्या में जेल हुई। बाद में उसने अपना नाम बदल लिया और उसकी योग्यता को देखते हुए उसे बिग बॉंस में शामिल किया गया। मेरा मानना है कि यह कार्यक्रम तो बेहूदगी की इंतहा है। जिसमें देश के जाने-माने चोरों तक को शामिल कर उन्हें प्रतिस्थापित करने की कोशिश की जाती है। उसे क्या कहेंगे।

खैर हैलीकॉप्टर बाबा को अपनी यात्रा के लिए हैलीकाप्टर का इस्तेमाल करने के लिए यह नाम दिया गया। भय्यूजी महाराज तो बहुत प्रभावशाली हैं वे पहले सियाराम एंड कंपनी के लिए माडलिंग करते थे। वे खुद को राष्ट्रसंत कहते हैं। उनके चंपूओ में पूर्व राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल, शरद पवार, प्रफुल्ल पटेल, नितिन गडकरी से लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तक शामिल है। 

बताते हैं कि जब वे मुख्यमंत्री थे तब अन्ना को उनके करीब लाने में बाबा ने बहुत अहम भूमिका अदा की थी। पिछले साल उन्होंने 49 साल की आयु में अपनी दूसरी शादी की। इन लोगों को राज्यमंत्री का दर्जा दिए जाने के बाद उनकी यात्रा रद्द हो गई है और अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद कें प्रमुख महंत नरेंद्र गिरी ने उनके इस कदम को सरकार को ब्लैकमेल करने वाला बताया है। यह सब देख कर मुझे एक घटना याद आती है। जब देवीलाल मुख्यमंत्री बने तो उनके एक बेटे प्रताप सिंह ने उनके खिलाफ बयान जारी करके काफी उलजलूल बातें कहीं। इस घटना के बाद देवीलाल ने उन्हें राज्य के एक निगम का अध्यक्ष बना दिया जिसमें गाड़ी बत्ती, बंगला व पैसे मिलते हैं। जब मैंने उनसे पूछा कि प्रतापसिंह तो आपके खिलाफ था फिर भी आपने उसे चेयरमैन बना दिया तो उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा, 'कुत्ता भौंक रहा था। मैंने उसके मुंह में हड्डी डाल दी है। अब चुपचाप उसको चूसता रहेगा।'

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