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कांग्रेस के बनवाए रास्ते पर भाजपा

अहमद पटेल कोई अर्जुन नहीं है और  न ही भाजपा कौरव हैं फिर भी अमित शाह गांधीनगर को कुरूक्षेत्र में बदल देने पर आमादा है। श्रीकृष्ण ने अपने जीवन के अंतिम दिन द्वारिकाधीश में बिताए थे मगर जाते-जाते भी वहां के डीएनए में इतना बदलाव कर गए कि हजारों साल बीत जाने के बाद भी वहां कौरवी जिद्द बनी हुई है। अहमद पटेल की इकलौती सीट भी अमित शाह कांग्रेस के लिए छोड़ देने को तैयार नहीं है। उनके हाथ से राज्यसभा की सीट छीनने की कोशिश में जुटे इंद्रप्रस्थ के मौजूदा शासक मानो कहना चाहते हैं कि वे तो एक इंच जमीन भी देने को तैयार नहीं है।

सच कहूं तो गांधीनगर में जो कुछ हो रहा है उसे देखकर मुझे लगता है कि एक बार फिर सत्ता के महाभारत की पुनरावृत्ति हो रही है। गुजरात में कांग्रेंस से लाए गए बलवंत राजपूत को राज्यसभा का तीसरा उम्मीदवार बना कर चाणक्य की भूमिका में आए अमित शाह यह साबित करने की कोशिश की है कि उनकी निगाह में अहमद पटेल कांग्रेंस की राजनीतिक हैसियत के प्रतीक बन गए हैं।

बचपन में तिलस्मी कहानियों में पढ़ा करते थे कि जिन्न की जान तोते में हुआ करती थी। अगर जिन्न में तकलीफ पहुचानी होती तो तोते की एक टांग तोड़-मरोड़ दी जाती व जिन्न उसकी तकलीफ में तड़पने लगता। वैसे उनका सोचना गलत भी नहीं है क्योंकि अहमद पटेन न केवल राजीव गांधी से लेकर सोनिया गांधी तक के सबसे ज्यादा विश्वासपात्र रहे बल्कि उन्होंने कोई पद लिए बिना ही दस साल तक यूपीए सरकार चलाई। जब मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री थे तब कहा जाता था कि सत्ता का असली केंद्र व उसकी पॉवर सप्लाई का जनरेटर तो विलिंग्डन क्रीसेंट रोड में लगा हुआ है। अहमद पटेल काजल की कोठरी में रहे। मनमोहन सिंह सरकार के कार्यकाल में कोयला खान आवंटन घोटाला हुआ। मगर सत्ता में आने के तीन साल बाद भी मोदी सरकार उनका सफेद कुर्ता पाजामा गंदा नहीं कर पाई उस पर कीचड़ लगाना तो दूर रहा, अभी तक उस पर भ्रष्टाचार के छींटे भी नहीं पड़े हैं।

पर शायद अमित शाह और नरेंद्र मोदी को लगता होगा कि देश को कांग्रेंस मुक्त बनाने का उन्होंने जो अभियान छेड़ रखा है उसके तहत सबसे पहले कांग्रेंस को यह संदेश देना है कि उनके चाणक्य अहमद पटेल अपने ही राज्य से अपनी सीट नहीं निकाल पाए। ऐसे में सोनिया गांधी व कांग्रेंस की क्या स्थिति होगी इसका सहज अनुमान लगाया जा सकता है। कांग्रेंसी तो हमेशा से सत्ता के भूखे रहे हैं। आजादी के बाद दशकों तक सत्ता का सुख भोगते-भोगते वे इसके इस कदर एडिक्ट (लती) हो गए है कि सत्ता हासिल करने के लिए अपना दीन-ईमान सब कुछ बेच सकते हैं।

गुजरात में जो हो रहा है वह इसका जीता जागता उदाहरण है। वहां कांग्रेंस को अमित शाह और नरेंद्र मोदी से कहीं ज्यादा अपने ही विधायको के भाग जाने या बिक जाने का डर सता रहा है। हालांकि जब कांग्रेंसी नेता मोदी-शाह द्वारा सत्ता हासिल करने के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले हथकंडों का जिक्र करते हैं तो मुझे उन पर हंसी आती है। मुझे देश के इस सबसे पुराने दल के साथ जरा भी सहानुभूति नहीं होती है क्योंकि आज उसके साथ जो कुछ हो रहा है उसके बीज तो कांग्रेंस ने ही बोए थे। आज राजनीति में जो वक्त आया है व जिस तरह के हथकड़े इस्तेमाल में लाए जा रहे हैं वे सब कांग्रेंस की ही देन है।

भाजपा द्वारा गुजरात व दूसरे राज्यों में विधायको, विधान परिषद सदस्यों की खरीदफरोख्त किए जाने की आलोचना करते समय कांग्रेंसी भूल जाते हैं कि इस सबकी शुरुआत तो उन्होंने ही की थी। देश आजाद होने के बाद 1952 में तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू की सरकार ने केरल की पट्टनभानपिल्ले सरकार को हटवा कर तत्कालीन राज्यपाल श्रीप्रकाश के जरिए वहां की विधासभा भंग करवा दी थी। विपक्षी दलो से लेकर इस पार्टी ने अपनी सरकारों  तक को नहीं बख्शा। उत्तर प्रदेश में कमलापति त्रिपाठी को हटाकर हेमवती नंदन बहुगुणा को आगे लाया गया। हालांकि वे आगे चलकर इंदिरा गांधी के लिए खतरा साबित हुए। राजस्थान में बरकतउल्ला सरकार की छुट्टी की गई। पंजाब में डा गोपीनाथ भार्गव से नाराज होने पर जवाहर लाल नेहरू ने उनकी छुट्टी की व भीमसेन को बैठाया । बाद में उनसे भी संबंध खराब हो गए तो प्रताप सिंह कैरो को कुर्सी थमा दी।

ये सब काम सियासी मनमानी, विधायको में असंतोष भड़का कर करवाए गए। उत्तर प्रदेश में तत्कालीन राज्यपाल रोमेश भंडारी ने जिस तरह से जगदंबिका पाल को एक दिन का मुख्यमंत्री बनाया था उसको तो पंचतंत्र की कहानियों में शामिल कर लिया जाना चाहिए। हरियाणा में पंडित भगवत दयाल शर्मा को कैसे बंसी लाल के जरिए डराया गया। जम्मू कश्मीर में शेख अब्दुल्ला को हटाकर बख्शी गुलाम मोहम्मद और आगे जीएमशाह को किसने मुख्यमंत्री बनाया? राजीव गांधी ने कैसे डा फारूक अब्दुल्ला के खिलाफ उन्हीं के बहनोई गुल मोहम्मद शाह से बगावत करवा कर उनकी सत्ता छीनी।

इस देश की राजनीति में भजन लाल संस्कृति को किसने स्थापित किया? आंध्र प्रदेश में दो-तिहाई बहुमत वाली एनटीआर सरकार को तत्कालीन राज्यपाल रामलाल ने कैसे गिराया, यह किसी से छिपा नहीं है। राज्यसभा का चुनाव तो बहुत छोटी बात है। इंदिरा गांधी ने तो पार्टी के आधिकारिक राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार नीलम संजीव रेड्डी को अंर्तरात्मा की आवाज पर वोट देने की अपील कर के हरवा दिया था। अब अगर कांग्रेंसी विधायक अमित शाह की अंर्तरात्मा की आवाज पर मतदान करते हैं तो इसमें आश्चर्य कैसा।

आखिर हाल ही में कांग्रेंस छोड़ने वाले शंकर सिंह वाघेला भी तो भाजपा से ही आयात किए गए थे। अब अगर उनके घुटने पेट की ओर मुड्ने पर उतारू हैं तो इसमें आश्चर्य कैसा? आजादी की लड़ाई में कांग्रेंस एक आंदोलन थी जो कि आजादी बाद सत्ता में आने के बाद सत्ता की संस्कृति बन गई। आज चाहे कोई भी दल या नेता हो कांग्रेंसी संस्कृति उसके लिए आदर्श बन चुकी है। परिवारवाद की सबसे ज्यादा आलोचना करने वाले समाजवादी तो जिदंगी भर इंदिरा गांधी के परिवारवाद के खिलाफ लड़ते रहे और आज लालू प्रसाद से लेकर मुलायम सिंह यादव ने कैसे परिवारवाद पनपाया वह इसी संस्कृति का कमाल है।

अगर कश्मीर में अब्दुल्ला व मुफ्ती परिवार पनपे है तो तमिलनाडु में द्रमुक व पंजाब में अकाली परिवार। किस-किस को याद दिलाएं। मतलब यह कि इस देश की राजनीति कभी परिवार से मुक्त हो ही नहीं सकती है। हमारे देश की राजनीति में कभी नैतिकता की कोई कीमत ही नहीं। कम-से-कम कांग्रेंस को तो इसकी दुहाई नहीं देनी चाहिए। डा जगन्नाथ मिश्र को पटना को गांधी मैदान व रेलवे स्टेशन गिरवी लेकर कर्ज लेने के मामले में बरी करने वाले सुप्रीम कोर्ट के जज, इस्तीफा देकर असम से संसद में पहुंचते हैं। नवंबर 1984  के दंगों की जांच करने वाले रंगनाथ मिश्र को यहीं पार्टी राजयसभा का सदस्य बनाती है।

इसलिए जब नरेंद्र मोदी व अमित शाह देश को कांग्रेंस मुक्त करने की बात करते हैं तो मुझे उन पर हंसी आती है क्योंकि आज कांग्रेंस एक पार्टी नहीं संस्कृति बन चुकी है। जो कांग्रेंस ने अपने 50 साल के शासन में किया उसकी उसी संस्कृति को महज तीन साल में मोदी शासन ने अपना लिया है। आज भाजपा में या सरकार मे जो कुछ हे रहा है वह अटल, आडवाणी, संघ, जनसंघ, भाजपा नहीं बल्कि कांग्रेंसी संस्कृति से है। पार्टियां बनती बिगड़ती रहती है पर संस्कृतियां व स्वभाव स्थाई होते हैं। इसलिए देश को कांग्रेंस मुक्त बनाने की बात करना ही हास्यास्पद है।

आप देश को गंदगी, डेंगू, मलेरिया और चिकनगुनिया से मुक्त तो बना नहीं पाए कांग्रेंस से मुक्ति कैसे दिलवाएंगे, उसकी संस्कृति तो उस कांग्रेंस घास की तरह है जो कि अनाज की कमी के दौरान अमेरिका से आयात किए गए पीएल-470 गेंहू के साथ इस देश में आ गई थी और बड़े से बड़े कृषि वैज्ञानिक भी आज तक उससे निजात नहीं दिला सके। भाजपा के नेताओं ने तो कांग्रेंसी संस्कृति को भरपूर गले लगाया है। हाल ही में किए गए एक अध्ययन के मुताबिक भाजपा में 62 फीसदी सांसद व 60 फीसदी मंत्री कांग्रेंसी मूल के हैं। ऐसे में भाजपा खुद ब खुद कांग्रेंस युक्त होती जा रही है। वैसे जिस अभियान के साथ मोदी-शाह शासन चला रहे हैं उसे देखते हुए पंकज शर्मा ने परसों यह शेर सही याद कराया कि “तुमसे पहले जो शख्स यहां तख्तनशीं था, उसे भी अपने खुदा हाने का यकीं था।“

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