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कनाड़ा में राज करेगा खालसा?

कनाड़ा में वहां की तीसरी सबसे बड़ी पार्टी न्यू डेमोक्रेटिक पार्टी का जगमीत सिंह को नेता चुन लिए जाने के बाद यह सवाल पूछा जाने लगा है कि क्या अमेरिका के इस पड़ोसी देश में कभी भारतीय मूल का कोई व्यक्ति प्रधानमंत्री बनेगा? जैसा कि मारीशस में हुआ था। उन्होंने अश्वेत होते हुए भी अपनी ही पार्टी के तीन गौरे उम्मीदवारों को हरा कर 53.6 फीसदी वोट हासिल करके निर्णायक जीत हासिल की। 

भारतीय मूल के मां-बाप की संतान 30 वर्षीय वकील जगमीत सिंह अक्टूबर 2019 में होने वाले आम चुनाव में प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो की लिबरल पार्टी को चुनौती देंगे। वे इस समय ओन्टोरियो से सांसद हैं। इस समय वहां की संसद हाऊस ऑफ कामंस में उनकी पार्टी के सांसद है। वे रंगीन पगडिया बांधते हैं और यू ट्यूब पर पगड़ी बांधना भी सिखाते हैं। 

अगर वे प्रधानमंत्री बने और कभी भारत आए तो उनकी स्थिति प्रधानमंत्री बनने के पहले वाले नरेंद्र मोदी जैसी हो जाएगी जिनकी अमेरिका यात्रा पर वहां की सरकार ने रोक लगा रखी थी और वह उन्हें वीजा देने को तैयार नहीं थी। 

जगमीत सिंह को भी भारत सरकार ने अपनी नजर रखने वाली सूची में डाला हुआ है। क्योंकि वे नवंबर 1984 के दंगों के मुद्दे उठाते रहे हैं। जब दो साल पहले एक एनजीओ ने उन्हें सम्मानित करने के लिए अमृतसर में एक समारोह का आयोजन किया तो सरकार ने उन्हें यहां आने के लिए वीजा नहीं दिया। जगमीत सिंह इस समय किसी दूसरे देश में प्रमुख संघीय राजनीतिक दल का नेतृत्व करने वाले अल्पसंख्यक समुदाय के पहले सदस्य है। 

उन्होंने कनाड़ा का अगला प्रधानमंत्री बनने के लिए अपना अभियान भी शुरू कर दिया है। संयोग से कनाड़ा दुनिया एक एकमात्र ऐसा देश है जहां सत्ता में सबसे ज्यादा सिखों को भागीदारी मिली है। वहां की सरकार में रक्षा मंत्री हरजीत सिंह सज्जन समेत चार सिख मंत्री है जबकि नरेंद्र मोदी सरकार में एक महिला समेत तीन ही सिख मंत्री है। दरअसल कनाड़ा में सिखों की अहमियत व सत्ता और समाज में 30 प्रतिशत भागीदारी बढ़ती ही जा रही है। 

वहां हर क्षेत्र मे सिख काफी अहम भूमिका अदा कर रहे हैं। इस समय वहां पांच फीसदी भारतीय हैं जिनमें से एक चौथाई सिख है। कुल भारतीय जनसंख्या में 35 फीसदी सिख व 28 फीसदी हिंदू व बाकी अन्य धर्मों के लोग हैं। इस देश मे पहला हिंदुस्तानी केसुर सिंह नाम सिख 1897 में जा कर वहां बसा था जो कि ब्रिटिश भारतीय सेना के रिसालदार मेजर थे और वहां महारानी विक्टोरिया के गोल्डन जुबली समरोह मे हिस्सा लेने आए थे। 

बाद में भारतीय श्रमिक वहां रेल लाइन व खानों में मजदूरी करने जाने लगे। ये लोग बहुत कम पैसो में काम करते थे व उसमें से भी पैसे बचा कर अपने घरों को भेज देते थे। वे अपने रिश्तदारों को भी बुलाने लगे। सन 1906 में कनाड़ा में दक्षिण एशिया के 5000 लोग रहते थे जिनमें से 1500 भारतीय सिख थे। धीरे-धीरे वहां का प्रेस, कर्मचारी संघ, नेता व मिशनरी  तक उनके खिलाफ हो गई। वे कहते थे कि ये तो गंदे लोग है जोकि अपनी दाढ़ी मूंछ तक साफ नहीं करते हैं। 

वहां के प्रधानमंत्री सिखों व दूसरे भारतीयों को देश छोड़कर होंडुरास व मैक्सिको जाने के लिए दबाव डालने लगे। मगर 1907 में वहां सेना से रिटायर हुए सैनिक पहुंचे और उन्होंने खालसा दीवान की स्थापना की व अगले ही साल वहां पहला गुरुद्वारा स्थापित कर दिया। इससे घबराई कनाड़ा सरकार ने वहां आने वाले विदेशी लोगों के पास न्यूनतम 200 डालर होने की शर्त लगा दी जोकि पहले मात्र 20 डालर थी। वहां रहने वाले भारतीयो ने ब्रिटिश सरकार के खिलाफ अभियान चलाने के लिए 1913 में गदर पार्टी स्थापित की

इसके बाद एक बहुत बड़ा ऐतिहासिक कांड हो गया। भारतीय मूल के सिंगापुर का एक व्यापारी गुरदित सिंह सरहाली ने एक जापानी जहाज कामागाटा मारू किराए पर लिया और कलकत्ता से 376 भारतीयो को लेकर कनाड़ा के लिए रवाना हुए। उनमें से 340 सिख, 24 मुसलमान व 34 हिंदू थे। जब यह जहाज कनाड़ा के तट पर पहुंचा तो वहां की सरकार ने उस पर सवार लोगों को वहां उतरने नहीं दिया। इस बीच गदर पार्टी के लोग भी जहाज पर चले गए और अपनी प्रचार सामग्री बांटने लगे। कनाड़ा सरकार की खुफिया एजेंसियों ने यह सूचना दी कि इस पर सवार लोग गदर पार्टी के समर्थक हैं। उस समय कनाड़ा भी ब्रिटेन के अधीन था। उन्हें न उतरने देने के मुद्दे पर कनाड़ा व अमेरिका में गदर पार्टी के लोग प्रदर्शन करने लगे। 

कनाड़ा सरकार ने इस जहाज को तट से दूर भेज दिया। इस पर यात्रियों व वहां की पुलिस के बीच झड़पे हुई। अंततः 23 जुलाई को यह जहाज वापस भेज दिया गया जोकि 27 सितंबर को कलकत्ता पहुंचा। वहां इसे पुलिस ने घेर लिया। जहाज पर गुरदित सिंह को गिरफ्तार करने के लिए जब पुलिस ने छापा मारा तो उसके समर्थकों व पुलिस के बीच हुए टकराव से 19 लोग मारे गए। तमाम यात्रियों को गिरफ्तार करके जेल भेज दिया गया। गुरदित सिंह फरार हो गया। 

उसने 1922 में महात्मा गांधी की अपील पर आत्म समर्पण कर दिया व उसे पांच साल की जेल की सजा हुई। इस घटना के कारण गदर पार्टी को भारत के बाहर के देशों में अपना प्रभाव बढ़ाने में काफी मदद मिली। आजादी के बाद 1952 में तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने बजबज में कामागाटा मारू स्मारक का अनावरण किया। सरकार ने 2014 में इसकी याद में 5 व 100 रुपए के सिक्के जारी किए। कनाड़ा में हर साल गदरी बाबियां दा मेला लगता है।

सरदार बवम सिंह ने कनाड़ा की तरफ से द्वितीय विश्व युद्ध में हिस्सा लिया और घायल होने के कारण उनका निधन हो गया। उन्हें वहां बहुत सम्मान के साथ देखा जाने लगा। इसी दौरान खालसा दीवान ने एशियाई मूल के लोगों के साथ किए जाने वाले नस्ली भेदभाव के खिलाफ आवाज बुलंद की। उन्हें मतदान का अधिकार देने की मांग की। कनाड़ा सरकार ने इस शर्त के साथ उन लोगों को मताधिकार देने का वादा किया कि इन लोगों को द्वितीय विश्व युद्ध में हिस्सा लेना होगा। हालांकि 1947 में सभी लोगों को यह अधिकार मिल गया था। 

उसके बाद सिखों ने मुड़ कर पीछे नहीं देखा। आज वहां हर शहर में गुरुद्वारे हैं। जहां रविवार को लंगर आयोजित होता है। वे तमाम त्यौहार मनाते हैं। इस देश में अंग्रेंजी व फ्रेंच के बाद पंजाबी तीसरी भाषा है। पिछले आम चुनाव में 20 एशियाई सांसद बने जिनमें से 18 सिख हैं। हाऊस आफ कामंस में तो पंजाबी तीसरी अधिकारिक भाषा है। सत्ता में आने के बाद 2016 में प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूदो ने कामागाटामारू कांड के लिए वहां की जनता से बैसाखी पर सार्वजनिक रूप से माफी मांगी थी। आपरेशन ब्लू स्टार बाद वहां काफी हिंसक गतिविधियां भी घटी। इंदिरा गांधी व कांग्रेंस के खिलाफ प्रदर्शन हुए। वैंकूवर स्थित भारतीय उच्चायोग पर सिखों ने हमले व प्रदर्शन किए। 

बब्बर खालसा नामक आतंकी संगठन ने कनाड़ा से मुंबई जा रहे एयर इंडिया के एआई-182 कनिष्क विमान को बम विस्फोट से उड़ा दिया। 23 जून 1985 को हुई इस दुर्घटना में 329 लोग मारे गए। जिसमें 298 कनाड़ा के नागरिक थे जिनमें से अधिकांश भारतीय मूल के थे। अब माहौल बदल चुका है वहां बाबा ढिल्लो सरीखे खरबपति प्रापर्टी के व्यवसायी हैं। वैकूवर की पंजाबी मार्केट में अंग्रेजी व पंजाबी में सरकारी बोर्ड लगाए गए हैं। और अब तो वहां रहने वालों की नजर प्रधानमंत्री पद पर लग गई है। वे कहावत है ना कि सिख व कौवा दुनिया के हर कोने में पाए जाते हैं। अब यह कहा जाएगा कि सिख तो हर जगह राज करते हैं।

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