सेल पर टूटती भीड़ और मंहगी जर्सी

विवेक सक्सेना
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क्रिसमस पर बेटे को आफिस से दो दिन 25 व 26 को छुट्टी मिली। इससे बड़ा संकट हुआ। समस्या थी कि अगले दिन क्या किया जाए? अपना मानना है कि बिना अखबार पढ़े दिन बिताना वैसा ही होता है जैसे कि बिना नमक का खाना खाना। नहाने, धोने के बाद बेटे ने कहा कि तैयार हो जाओ हम लोगों को घूमने चलना है। अतः कपड़े बदले और उसके साथ निकल लिए। 

बेटी की रिहायश का इलाका पार करने के बाद खेत नजर आए। ऐसा लगा कि जैसे गुड़गांव से सटे ग्रामीण इलाके में है। करीब 25-30 मिनट की ड्राइविंग के बाद हम लोग एक बहुत बड़े माल तवासीन मिल पहुंचे। मैंने अपने जीवन में इतना बड़ा माल नहीं देखा था। पता चला कि वह 1.20 लाख वर्ग मीटर में फैला हुआ है। बाहर पानी बरस रहा था। जब माल के अंदर पहुंचे तो वहां बहुत लंबी लाइन लगी हुई थी। अगर हम लाइन में लगते तो अंदर जाने में घंटों लग जाते। 

बेटे ने बताया कि उस हाल में जितने लोग बाहर निकलते है उतने ही अंदर भेजे जाते हैं। वहां 120 स्टाल थे। जहां कनाड़ा व अमेरिका की जानी-मानी फैशन व कपड़ा कंपनियों का सामान 25 से 70 फीसदी तक छूट पर बेचा जा रहा था। पता चला कि इस सेल का नाम बक्सिंग सेल था। जो कि क्रिसमस से अगले दिन शुरू होती है और नववर्ष तक चलती है। भीड़ इतनी ज्यादा थी कि खड़े-खड़े परेशान हो गया। अचानक पत्नी व बेटा एक कम भीड़ वाले स्टाल पर ले गए जोकि ऑर्मी हिलफिगर नामक किसी जानी-मानी अमेरिकी कपड़ा बनाने वाली कंपनी की थी। 

पत्नी और बेटे ने मेरे लिए कपड़े ढूंढ़ने शुरू किए। हालांकि मेरे मन में खरीदने की इच्छा नहीं थी। अचानक वे लोग एक काले रंग का कोट/जैकेट लेकर आए। जब मैंने ट्रायल के लिए उसे पहना तो वह वास्तव में काफी गर्म थी। पसंद आने पर वे लोग खुश हो गए और बेटे व पत्नी ने अपने लिए भी कुछ कपड़े लिए। मेरे लिए भी पूरी बांहों की गर्म शर्ट ली और वह पैसे चुकाने के लिए लंबी लाइन में लग गया। करीब आधे घंटे बाद उसका नंबर आया। वह पैसे अदा करके विक्रेता से भाव ताव किए बिना वहां से निकला। 

मैंने उससे पूछा कि इस जर्सी में ऐसी क्या खास वजह है तो वह उलाहना भरे स्वरों में बोला कि आपने जो जैकेट खरीदी है वह 25,000 रुपए की थी। सेल में महज 7000 में मिल गई। मेरी समझ में नहीं आया कि उससे क्या कहूं। मैंने अपने जीवन में आज तक इतनी महंगी जैकेट या कोई और कपड़ा नहीं पहना था। पर वे लोग काफी खुश थे। वहां गजब की भीड़ थी। आने वाले ज्यादातर लोग भारतीय थे। थोड़ी मात्रा में चीनी व कनाड़ा के लोग भी थे। 

खड़े-खड़े भूख लग आई थी पर जब फूड कोर्ट की और गए तो पाया कि पूरा इलाका खचाखर्च भरा है। लंबी लाइन देख कर लगा कि यहां तो शाम तक खाना खाने का नंबर ही नहीं आएगा। लोग सपरिवार वहां आए थे। कुछ बच्चे मोटर चलित खिलौनो की सैर करते हुए घूम रहे थे। यह सब देखकर याद आया कि सेल के प्रति पागलपन सिर्फ भारत में ही  नहीं हैं। जब दिल्ली में काफी सर्दी पड़ती है तो जनपथ होटल में लुधियाना की मोहिनी कंपनी के गर्म कपड़ों की सेल लगती थी व महिलाएं वहां काफी पहले से आकर लंबी लाइनों में खड़े होकर सामान खरीदती थी। 

मुझे तो तब भी वह पागलपन ही लगता था। जब हम लोग कई किलोमीटर में फैले पार्किंग से बाहर निकले तो हमें मुख्य सड़क तक आने में एक घंटा लग गया। मुख्य सड़क पर आने-जाने वाली गडियो की भींड़ देखकर यह अंदाजा हो जाता है कि वहां कितनी बड़ी तादाद में लोग आ जा रहे थे। खैर जब वापस आकर सेल का इतिहास ढूंढ़ा तो पता चला कि अमेरिका व कनाड़ा में हर साल कई अहम सेल लगती है। पहली सेल यहां के थैंक्स गिविंग त्यौहार के अगले दिन या नवंबर के चौथे शुक्रवार को लगती है क्योंकि यह माना जाता है कि उसी दिन से क्रिसमस की खरीदारी शुरू होती है। इसे ब्लैक फ्राइडे भी कहते हैं। बताते कि कि काफी पहले दुकानदार अपने खातों में मुनाफे की राशि दिखाने के लिए दो रंगों की स्याही का इस्तेमाल करते थे। 

घाटा होने पर राशि के नीचे लाल पेंन से व फायदा होने पर काले पेन से लाइन खींच दी जाती थी। चूंकि यह मुनाफे का काम था अतः इसे ब्लैक फ्राइडे सेल कहा जाने लगा। इन देशों की तमाम बड़ी कंपनियां यह सेल लगाती है। जबकि बक्सिंग सेल क्रिसमस के अगले दिन शुरू होती है। कई बार तो लोग सुबह से ही लाइने लगाना शुरू कर देते हैं। यह नववर्ष तक चलेगी। फिर याद आया कि दोनों देशों में कितना अंतर है। भारत में हमारे पिताजी कहते थे कि त्यौहार के दिन तक अपने मान्य लोगों को उपहार दिए जाते हैं व त्यौहार के बाद परजों (प्रजा) काम करने वालो को। 

बेटे ने बताया कि यहां त्यौहार के बाद बड़ी कंपनियां व अमीर लोग गरीबों को कपड़े व दूसरा सामान उपहार के रूप में बांटते हैं। इसी ने बाद में सेल का रूप ले लिया। फिर मित्र मुकेश शर्मा का फोन आया तो बातचीत में उसने बताया कि दूसरे देश में खाने-पीने के सामान समेत हर उपभोक्ता वस्तु की एक शैल्फ लाइफ होती है। यह खत्म होते ही बड़ी कंपनियां बाजार से अपना सामान वापस मंगाने लगती है। हालांकि तमाम कंपनियां सामान वापस भेजने का विरोध करने लगी है। उनका मानना है कि इस सामान को उसकी निर्माता कंपनी द्वारा डिस्काउंट में सेल में बेचना कहीं ज्यादा फायदे में है। यह सब देखकर मुझे सिर्फ यही लगा कि बच्चे सामान के सस्ता होने पर खुशी महसूस कर रहे हो। मगर मुझे तो लगता है कि उनकी लागत व बिक्री मूल्य में बहुत ज्यादा अंतर, मार्जिन होता होगा। बहरहाल मैंने, शायद जीवन में पहली व अंतिम बार इतना महंगा कपड़ा खरीदा।

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