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सरकार बनाए राष्ट्रीय धरोहर कोष!

आखिर प्रियो दा यानी प्रियरंजनदास मुंशी दुनिया छोड़ गए। जो व्यक्ति जीवन भर बेहद जुझारू जिंदगी जीता आया हो उसका इस तरह से लगभग एक दशक तक गुमनामी की जिदंगी बिताने के बाद दुनिया से चले जाना कुछ अच्छा नहीं लगा। यह भी क्या विडंबना है कि जो लोग अपने जीवन काल में बेहद सक्रिय रहते आए थे उनमें से कुछ को जीवन के अंतिम दिनों में गुमनामी की जिदंगी बिताने के लिए मजबूर होना पड़ा। 

पूर्व प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी व पूर्व रक्षामंत्री जार्ज फर्नीडीस भी इन्हीं लोगों में शामिल है। अटलजी अपने राजनीतिक जीवन में बेहद सक्रिय रहे। वे तीन बार प्रधानमंत्री बने। जार्ज ने तो आपातकाल के दौरान जिस तरह से सुर्खियां बटोरी उसकी मौजूदा पीढ़ी कल्पना भी नहीं कर सकती है। मगर समय का खेल तो देखिए कि आज ये दोनों ही नेता अलमाइजर रोग से पीडित है और यह समझने बूझने में असमर्थ है कि उनके साथ व उनके आस-पास क्या हो रहा है? 

जिन कंधों पर कभी देश का भार उठाने की जिम्मेदारी थी व जो हाथ कभी देश की सुरक्षा की कमान थामे हुए थे वे आज अपने शरीर का भार उठाने या सूप का चम्मच अपने मुंह तक ले जाने के काबिल नहीं रहे। प्रियरंजनदास मुंशी ने भी करीब नौ साल तक यह स्थिति झेली। उनकी गिनती पश्चिम बंगाल के उन नेताओं में की जाती थी जिन्होंने प्रदेश का सबसे हिंसक दौर देखा व नक्सलवादियों की हिंसक गतिविधियों के बावजूद राज्य में कांग्रेंस का हाथ थामे रखा। 

राज्य में पार्टी की सिद्धार्थ शंकर रे सरकार बनवाने में अहम भूमिका अदा की। हालांकि बंगाल के पानी की यह खासियत रही है कि वहां कभी कांग्रेंस एकजुट होकर नहीं रह पाई। जब तक प्रियो दा सक्रिय रहे उनका तथा ममता बनर्जी का आपस में टकराव होता रहा। वे बेहद मिलनसार नेता थे और मंत्री रहते हुए भी पत्रकार उनसे बिना समय लिए मिल सकते थे। 

सूचना एवं प्रसारण मंत्री रहते हुए उन्होंने जहां एक और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के क्षेत्र में उदारता दिखाई और बड़ी तादाद में निजी चैनलों को आगे आने का मौका दिया वहीं दूसरी और अश्लीलता को बढ़ावा देने वाले विदेशी चैनलों की जमकर खबर लीं। उनका जन्म 13 नवंबर 1945 को दिगापुर पूर्व जिले में हुआ था जो कि अब बांग्लादेश में हैं। 

वे पहली बार महज 26 साल की उम्र में लोकसभा के लिए चुने गए। उसी साल उन्हें भारतीय युवा कांग्रेंस का अध्यक्ष बनाया गया। वे उन अध्यक्षों में शामिल थे जो कि वास्तव में युवा थे। वरना यूथ कांग्रेंस की तो यह परंपरा रही थी कि उसमें ज्यादातर सींग कटवा कर आए बैलो को अध्यक्ष बनाया जाता रहा है। संजय गांधी ने उन्हें हटा कर अपनी करीबी अंबिका सोनी को युवक कांग्रेंस का अध्यक्ष बना दिया। वे इस अपमान को नहीं भूले और इंदिरा गांधी की हार के बाद पार्टी छोड़कर देवराज अर्स की कांग्रेंस (एस) में शामिल हो गए व उसके पश्चिम बंगाल के अध्यक्ष बने। 

उन दिनों वे कांग्रेंस से इतने ज्यादा नाराज थे कि उन्होंने कई बार सार्वजनिक तौर पर यह बयान दिया था कि अगर मैं इस पार्टी में वापस जाऊं तो अपने कुत्ते को मेरे नाम से पुकारने लगिएगा। मगर वे पुनः कांग्रेंस में आए और राजीव गांधी के विश्वासपात्र बने। वे सोमेन मित्रा के बेहद करीब हुआ करते थे। ममता बनर्जी से उनका हमेशा टकराव होता रहा। हालांकि उनकी गिनती ऐसे नेताओं में हुआ करती थी। अधीर रंजन सेन बताते है कि जब 2006 में फीफा का वर्ल्ड कप हुआ तो वे उसके कमिश्नर थे। उन्होंने मैच देखने के लिए उनसे टिकट मांगा। प्रियोदा ने उन्हें मुफ्त में कंप्लिमेटरी पास दिया। जब वे जर्मनी पहुंचे तो पता चला कि वह पास कहीं खो गया है। उन्होंने उनको फोन करके पूरी बता बताई तो उन्होंने उनको नया टिकट भिजवा दिया। 

अगले दिन जब वे होटल का बिल अदा करने के लिए रिसेप्शन पर पहुंचे तो उन्हें पता चला कि दासमुंशी ने उनका बिल अदा कर दिया था। हालांकि इतने दिलदार नेता की कभी अपनी ही पार्टी की ममता बनर्जी से नहीं पटी। जब तक वे जीवित रहे तब तक उनका व ममता में टकराव होता रहा। उनके न रहने पर कांग्रेंस ने ममता बनर्जी के खिलाफ उनकी पत्नी दीपा मुंशी को उम्मीदवार बनया मगर वे उनके आगे विधानसभा चुनाव हार गई। 

सोमेन मित्रा उनके करीबियों में से थे। पार्टी उन्हें सियालहाट लोकसभा का टिकट देने के मुद्दे पर संशय में थी। अचानक एक दिन दासमुंशी सियालहाट पहुंच गए और वहां चुनावी सभा कर डाली जिसमें उन्होंने ऐलान कर दिया कि सोमेन मित्रा यहां से उम्मीदवार है और उन्हें जिताना चाहिए। इसके बाद हाईकमान के पास सोमेन मित्रा को अपना उम्मीदवार घोषित करने के अलावा कोई और विकल्प हीं नहीं बचा था। 

पांच बार लोकसभा सांसद रहे इस जुझारू नेता को 12 अक्टूबर 2008 को दिल का दौरा पडा व उसके बाद रक्त का चक्का जम जाने के कारण उन्हें पक्षाघात हो गया।  उन्हें शुरू में एम्स में भर्ती करवाया गया। उन्हें सैमसैल उपचार के लिए जर्मनी के हसेलडोर्फ में भी ले जाया गया मगर वे ठीक नहीं हो पाए और उनके दिमाग ने काम करना शुरू नहीं किया। 

वे बिस्तर पर लेटे रहते थे। उन्हें भारत लाकर अपोलो अस्पताल में भर्ती करवा दिया गया। चूंकि वे केंद्रीय मंत्री रहे थे अतः उनके ईलाज का सारा खर्च सरकार उठा रहीं थी। तीन साल बाद 2011 में अपोलो के प्रमुख डा प्रतापचंद्र रेड्डी ने यह कहा कि उनकी हालत में सुधार होने की कोई संभावना नहीं है और उनका कोई ऐसा ईलाज नही किया जा रहा है जो कि उनके घर पर न हो सकता हो। अतः बेहतर होगा कि उनका परिवार उन्हें घर ले जाए। मगर उनकी पत्नी दीपामुंशी ने उन्हें घर ले जाने से यह कहते हुए इंकार कर दिया कि इन्हें संभाल पाना मेरे बस का नहीं है। घर में उनका इकलौटा बेटा था जोकि दिल्ली पब्लिक स्कूल में पढ़ रहा था। जब तक यूपीए की सरकार रही तब तक कोई समस्या नहीं आई थी। उनके अस्पताल का बिल सरकार चुकाती रही। 

जब केंद्र मे मोदी सरकार सत्ता में आई तो तत्कालीन स्वास्थ्य मंत्री डा हर्षवर्धन ने एक सवाल के जवाब में बताया कि चूंकि प्रियरंजन दास मुंशी ने देश के लिए बहुत कुछ किया है इसलिए देश का कर्तव्य है कि वह उनके लिए कुछ करे। इसके साथ ही ईलाज का सिलसिला जारी रहा और सरकार अस्पताल के बिल अदा करती रही। बताते है कि उन पर हर दिन एक लाख रुपए खर्च हो रहे थे। ऐसे में जब एक मध्यमवर्गीय परिवार का बच्चे के अस्पताल ईलाज पर फोर्टिस अस्पताल द्वारा 16 लाख रुपए का बिल थमा देने की खबर आती है तो लगता है कि हमारे देश में कितने विरोधाभास है। आम आदमी को ईलाज के लिए किन हालात से गुजरना पड़ता है। जार्ज फर्नीडीस तो अपवाद है क्योंकि आज उनकी देखभाल उनकी पत्नी लैला कबीर कर रही है। मगर अटल बिहारी वाजपेयी, जसवंत सिंह आदि की देखभाल तो देश के भरोसे है। 

इसलिए मेरा मानना है कि नेता, पत्रकार, लेखक बुद्धिजीवी ये सभी राष्ट्रीय संपत्ति (धरोहर) घोषित कर दिए जाने चाहिए। वे जो कुछ अर्जित करे वह सब राष्ट्र की संपत्ति मानी जाए और जब उनका ईलाज कराने का, देखभाल की नौबत आए तो राष्ट्र अपनी जिम्मेदारी निभाए क्योंकि ऐसे मामलों में अक्सर परिवार अपनी जिम्मेदारी से मुकर जाते है। मोदी सरकार को एक ‘राष्ट्रीय धरोहर कोष’ बना देना चाहिए जिसमें इन तमाम वर्गो की संपत्ति, जमाकोष व भविष्य में जरूरत पड़ने पर उसी से उनकी देखभाल हो। वैसे भी मोदीजी का परिवार तो सुख में भी उनके साथ नहीं है।

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