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उनका हैलोवीन हमारे श्राद्ध, बैसाखी

उस उदारीकरण के बाद जब हमारे देश में बहुरराष्ट्रीय कंपनियों की दखल बढ़ी तो उनके साथ ही तमाम नए शब्द, नए पद और नए उत्सव भी भारत आए। जैसे कि सीईओ, सीएफओ देखने को मिले। कसरत के लिए वर्कआउट सरीखा शब्द इस्तेमाल किया जाने लगा। हमने मदर्स डे, सिस्टर्स डे, फादर्स डे से लेकर वेलेंटाइन डे तक मनाना शुरू कर दिया क्योंकि इससे पहले तो देश में 5 सितंबर को टीचर्स डे व 14 नवंबर को बाल दिवस ही मनाया जाता था। हमें पता चला कि टॉफी चाकलेट व टैडी बियर का ये दिन होता है। 
इसके बावजूद मैंने भारत में हैलोवीन मनाया जाते नहीं देखा था। मगर पिछले दिनों जब परिवार की एक बच्ची ने जोकि पब्लिक स्कूल में पढ़ती है, सोशल मीडिया पर हैलोवीन पोशाक में अपनी तस्वीर पोस्ट की तो पता चला कि अब यह पर्व भी हमारे यहां आ पहुंचा है। क्या संयोग रहा कि इस बार हैलोवीन के ही दिन अमेरिका में एक आतंकवादी ने फुटपाथ पर ट्रक चढ़ा कर आठ लोगों की जाने ले ली और 11 को गंभीर रूप से घायल कर दिया। 
अमेरिका, कनाड़ा व यूरोप के तमाम देशों में मनाया जाने वाला हैलोवीन पर्व वहां के समाज में बेहद अंहमियत रखता है। अमेरिका में तो क्रिसमस के बाद सबसे ज्यादा खरीददारी हैलोवीन पर ही की जाती है। पहले यह जान लिया जाए कि यह पर्व होता क्या है? पूरी दुनिया में हर धर्म में लोग आत्माओं में विश्वास करते हैं। उनका मानना है कि मरने के बाद आत्माएं अक्सर शैतान बन जाती है जो कि उन्हें परेशान कर सकती है। तमाम समाजों और धर्मों में आत्माओं की शांति व उनके प्रति सम्मान व्यक्त करने के लिए कुछ-न-कुछ धार्मिक उपाय किए जाते हैं। जैसे कि हम लोग अपने बुजुर्गो की आत्माओं को खुश करने के लिए श्राद्ध के दौरान उनका तर्पण करते हैं।
सो इसे शुरू से ही 31 अक्टूबर को मनाया जाता रहा है। पोप  तृतीय ने 8वीं शताब्दी में 1 नवंबर को आल सेंट्स डे (संत दिवस) घोषित कर दिया। उस दिन बच्चे व गरीब लोगों के घर जाकर उनका दरवाजा खटखटाते। उनके लिए प्रार्थनाएं करते और बदले में उन्हें खाने की चीजें खासतौर से चॉकलेट उपहार में दी जाती। समय के साथ-साथ हैलोविन में भी आल सेंट्स डे की कुछ चीजें जुड़ गई। 9वीं सदी में जब आयरलैंड में आलू की फसलें नष्ट हो जाने के कारण भयंकर अकाल पड़ा तो बहुत बड़ी संख्या में आयरिश लोग पलायन करके, अमेरिका पहुंचे। उनके आने के साथ ही हैलोवीन भी वहां पहुंच गया। 
इसे किस स्तर पर वहां मनाया जाता है इसका अनुमान तो इस बात से लगाया जा सकता है कि अमेरिका में साल भर में चॉकलेट की जितनी बिक्री होती है उसकी एक चौथाई बिक्री हैलोवीन के दौरान होती है। इस वर्ष हैलोवीन पर अमेरिका में 5000 टन चॉकलेट की बिक्री हुई। इस मौके पर लोग कपड़ो, ग्रीटिंग कार्ड व सजावटी सामान मुखौटे आदि पर काफी पैसा खर्च करते हैं। वे खुद को आत्मा दिखाने के लिए तरह-तरह के कंकाल वाले कपड़े पहनते है। खुद को कंकाल की तरह सजाते हैं। इस दिन कद्दू से बनाई गई एक विशेष लालटेन जलाई जाती है। कद्दू को तराश कर उसमें आंख, नाक, कान बनाए जाते हैं। पहले यह लालटेंन शलजम से बनाई जाती थी। 
अमेरिका में कद्दू काफी बड़े आकार के होते है। 1993 में वहां एक कद्दू ने विश्व रिकार्ड बनाया था। उसका वजन 836 पौंड था। हैलोवीन पर पहने जाने वाले कपड़ों व दूसरे सामान के रंग नारंगी व काले हाते हैं। नारंगी रंग, तैयार फसल व समृद्धि का प्रतीक माना जाता है व काला रंग मृत्यु व अंधेरे को प्रदर्शित करता है।
मगर ज्योतिषी बताते हैं कि अमुक व्यक्ति पितृ दोष का शिकार है और पित्रों को शांत करने के लिए राजस्थान के पुष्कर में विशेष पूजा की जाती है। इस्लाम में भी शबे बरात मनाई जाती है जब कि घर वाले दिवंगत आत्माओं की शांति के लिए उनकी कब्रों पर जाकर वहां फुलमालाएं चढ़ाते है। उन्हें श्रद्धाजंलि देते हुए दीपक जलाते हैं। हैलोवीन भी मृतको को खुश रखने के लिए मनाया जाने वाला पर्व था मगर अब इसमें आत्माओं से ज्यादा मौज-मस्ती शामिल हो चुकी है। 
खास बात यह है कि इसका अमेरिका से कुछ लेना-देना नहीं है और यह तो ईसाई धर्म के अस्तित्व में आने से भी पहले से मनाया जाता रहा है। करीब 6 हजार साल पहले ब्रिटेन, आयरलैंड व उत्तरी यूरोप के लोग ‘सो इन’ पर्व मनाते थे जोकि आगे चलकर हैलोविन नाम से जाना जाने लगा। यह मूलतः सिल्ट आदिवासियों द्वारा मनाया जाने वाला त्यौहार था। इसे गर्मी के अंत व जाड़े की शुरुआत के साथ मनाया जाता था। 
यूरोप की सर्दियां बहुत भयंकर होती है और वहां कई दिनों तक सूरज के दर्शन नहीं होते हैं। वे लोग मानते थे कि चूंकि गर्मी को समाप्ति के साथ ही फसलें सूख जाती है व सर्दियों में अंधेरा बढ़ने लगता है अतः इस दौरान बड़ी संख्या में आत्माएं निकल आती है जोकि लोगों को परेशान कर सकती है। सैलिटक लोग आत्माओं को खुद से दूर रखने व उन्हें धोखा देने के लिए उस दिन जानवरों की खाल से बने कपड़े पहन कर उनके सिर अपने सिर पर रख कर घूमते थे। वे अजीबो गरीब कपड़े पहनते व हरकते करते। इससे आत्माओं को लगता कि वे भी उनके जैसे ही है और वे उन्हें छोड़कर किसी और की तलाश करती। इस तरह से वे उनके प्रकोप से बच जाते थे।
वैसे इस तरह के त्यौहार दुनिया के कुछ और देशों में भी बनाए जाते हैं। चीन में तेंग ची नामक त्यौहार पर आत्माओं को याद किया जाता है। इस मौके पर लालटेन उत्सव मनाया जाता है जिसमें दूसरे पशुओं की शक्ल वाली लालटेन बना कर मृतको की तस्वीरो के सामने फूल फल आदि रखकर उनसे आशीर्वाद मांगा जाता है। हांगकांग में तेन नामक उत्सव पर आत्माओं को, खासतौर पर नाराज भूतों को खुश करने के लिए उन्हें चटाई दी जाती है। 
अहम बात यह है कि फ्रांस व आस्ट्रेलिया में हैलोवीन नहीं मनाया जाता है। इन देशों का कहना है कि अमेरिका में व्यवसायीकरण का नतीजा है यह त्यौहार। वहां अपना माल बेचने के लिए कंपनियों ने इस त्यौहार को प्रचारित किया है। न्यूयार्क में तो हैलोवीन परेड में करीब 50 हजार लोग शामिल होते हैं जिसे 20 लाख दर्शक देखते हैं। संयोग से जाने-माने जादूगर हैरी हुडनी की मौत भी 1926 में हैलोवीन के ही दिन हुई थी। 
उस दिन एक शो के दौरान उन्होंने अपने पेट पर जो तीन मुक्के मरवाए थे वे उनके लिए जान लेवा साबित हुए थे। अगर यह कहा जाए कि हैलोवीन त्यौहार बैसाखी और श्राद्ध का मिला जुला रूप है तो कुछ गलत नहीं होगा। हमारे देश में बैसाखी पर पंजाब में बच्चे घर-घर जाकर वहां से खाने-पीने का सामान व उपहार एकत्र करते हैं। जबकि मकर सक्रांति को माना जाता है कि अब गर्मी की शुरुआत होने वाली है। वहां हैलोवीन से जाड़े की शुरुआत होती है।
 

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