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मेट्रो सफर मानो गंगा स्नान

दिल्ली में मेट्रो तो बहुत पहले ही चलनी शुरू हो गई थी मगर मैंने अभी तक उसमें सफर ही नहीं किया। साल में एकाध बार जरूर उसमें तब सफर करता था जबकि दीपावली पास आ रही होती और मुझे बिजली की लडिया आदि खरीदने भगीरथ पैलेस जाना होता। वहां गाड़ी ले जाने में बहुत दिक्कत आती थी क्योंकि आसपास पार्किंग के लिए जगह नहीं होती है और कार का चालान कटने का भी खतरा बना रहता। इसलिए प्रेस क्लब पर कार खड़ी करके मेट्रो से चादंनी चौक जाता और वहां से टहलता हुआ भगीरथ पैलेस जाकर खरीददारी करके वापस लौट आता। 

चूंकि इस रूट पर तथा इस इलाके में काफी भीड़ रहती है अतः मैं वहां जाते समय अपना पर्स घर में ही रख कर जाता था। एक पुराने पर्स में रुपए रख लेता था ताकि अगर कोई जेबकतरा उस पर हाथ साफ कर दे तो कम से कम ड्राइविंग लाइसेंस व दूसरे पहचान पत्र सरीखे जरूरी कागजतों से हाथ न धोना पड़े। मगर जब मैंने पंडारा रोड़ छोड़ा तो हालात बदल गए। अक्सर ऐसा होता है कि हम पति-पत्नी दोनों को ही कनाट प्लेस की ओर जाना होता है। हम लोगों के बैंक अभी भी खान मार्किट में ही है। 

अब वहां जाना मेरे लिए कुछ वैसा ही हो गया जैसे कि जब कानपुर में था तो दूर-दराज के लोग शहर के बीच में स्थित बिरहाना रोड या माल रोड जाते हुए कहते थे कि वे शहर जा रहे हैं। मेरे लिए भी लुटियन जोन अब शहर हो गया है। जब भी मैं वहां जाता हूं तो तमाम काम निपटाने होते हैं। इनमें संसद जाना, मीडिया सेंटर जाना या प्रेस क्लब जाकर मित्रों से मुलाकात कर चाय पीना भी शामिल होता है। 

अक्सर यह होता है कि मुझे प्रेस क्लब पर छोड़कर ड्राइवर पत्नी को लेकर चला जाता है। वो अपनी शापिंग कर या दूसरे काम निपटा कर वापिस लौटते समय मुझसे पूछ लेती है कि क्या मैं साथ चलूंगा? आमतौर पर मैं साथ वापस नहीं लौटता हूं व करीब चार बजे सुशील राजेश के साथ मेट्रो का सफर करते हुए नोएडा सेक्टर-15 पहुंचता हूं व जब अक्षरधाम स्टेशन आता है तो ड्राइवर से लेने आने के लिए कह देता हूं। वहां तक पहुंच कर नीचे उतरने में करीब 15 मिनट लगते हैं और इतनी देर में ड्राइवर वहां पहुंच जाता है। सच कहूं तो मेट्रो यात्रा करने का मेरा बहुत अच्छा अनुभव रहा है। 

जिन दो चीजों ने मुझे सबसे ज्यादा प्रभावित किया है वह है वहां की स्वच्छता। समय का अनुशासन व उसमें सफर करने वाले यात्री। प्रेस क्लब से हमें मंडी हाउस आना होता है और वहां से नोएडा जाने वाली मेट्रो पकड़नी पड़ती है। मेट्रो स्टेशन पर भीड़-भाड़ तो काफी होती है मगर गदंगी का कहीं नामो-निशान नहीं होता। आपको प्लेटफार्म पर कागज का कोई टुकड़ा तो दूर रहा टाफी का रैपर तक पड़ा नहीं मिलेंगा। यही हालात वहां के रेल ट्रेक की भी है। कहीं कोई खाली कैन या किसी और तरह की गदंगी नजर नहीं आती है। यहीं हालात मेट्रो ट्रेन की भी हैं। डिब्बे आज भी नए लगते हैं और उनके बाहर के पेंट पर एक खरोच तक नजर नहीं आती है। 

यह वही दिल्ली है जहां सोसायटी या मुहल्लों तक में बाहर खड़ी कारों की कुछ लोग महज शैतानी के लिए कील मार कर खराब कर देते हैं। उन पर निशान डाल देते हैं। डिब्बों के अंदर की भी स्वच्छता काबिले तारीफ होती है। मुझे देखकर आश्चर्य होता है कि वहां अंदर लगे जानकारी देने वाले किसी स्टिकर तक को किसी ने उखाड़ने की कोशिश नहीं की जबकि शहर में सड़कों पर दिशा निर्देश देने वाले तमाम बोर्डो पर लगे स्टिकर लोगों का शिकार बन चुके हैं। उन्हें उखाड़ कर बदरंग किया जा चुका है। 

दूसरी अहम चीज है यहां समय का पालन। आमतौर पर हम हिंदुस्तानियो के लिए समय की कोई कीमत नहीं होती है। आमतौर पर कार्यक्रम समय से शुरू नहीं होते। रेलगाडियां या विमान समय पर उड़ान नहीं भरते। दफ्तरों में समय पर काम शुरू नहीं होता। जब भी कहीं कुछ देर होती है तो यही सुनने को मिलता है कि बस पांच मिनट में शुरू होने वाला है। मेरा मानना है कि हमारे पांच मिनट का मतलब 10 मिनट से लेकर आधा घंटा तक कुछ भी हो सकता है। 

मगर अगर प्लेटफार्म पर लगे उस बोर्ड पर नजर डाले जिसमें अगली मेट्रो की सूचना दी जा रही होती है तो आपको पता चलेगा कि यहां दो मिनट का मतलब दो मिनट ही होता है। गाड़ी तय समय पर आती है आमतौर पर एक मिनट तो क्या 10-20 सैकेंड भी लेट नहीं होती। अब मैं यह गणना कर लेता हूं कि प्रेस क्लब से मंडी हाउस तक पहुंचने व वहां मेट्रो बदल कर नोएडा पहुंचने व वहां से बाहर निकलने में मुझे कितना समय लगेगा। 

इस गणना में शायद ही कभी कुछ मिनटो का अंतर होता है। सबसे खास चीज तो मेट्रो के सफर करने वाले यात्रियों का व्यवहार है। मैंने जब भी सफर किया तो पाया कि 90 फीसदी यात्री 20 से 35 साल के बीच के युवा थे। लड़का हो या लड़की सबके कानो में मोबाइल के इयरफोन लगे होते हैं। कुछ गानों का आनंद ले रहे होते हैं तो कुछ लोग अपने मोबाइल के साथ खेल रहे होते हैं। जहां मुंबई की लोकल में मैंने लोगों को जोर से बात करते या अक्सर भजन तक करते गाना गाते या भीख मांगते देखा वहीं दिल्ली में ऐसा कुछ भी नजर नहीं आता है। 

मैंने पाया कि जिस दिल्ली में अखबार हर दिन महिलाओं के साथ होने वाली छेड़खानियों या तकलीफो की खबरों से भरे होते हैं, वहीं यहां की मेट्रो में मैंने आज तक किसी युवक को किसी महिला पर फबती करते हुए तक नहीं देखा। छेड़छाड़ करना तो बहुत दूर की बात है। डिब्बो में भी भीड़ होने के बावजूद कोई महिलाओं से चिपकने या छूने की कोशिश नहीं करता है। अक्सर मैंने देखा कि अगर हमें बैठने की सीट नहीं मिलती है तो कुछ युवा सुशील को अपनी सीट पर बैठने के लिए कहते हुए खुद खड़े हो जाते हैं। एक दिन सुशील ने मुझे इसकी वजह बताते हुए कहा कि अगर तुम्हे मेट्रो में सफर करना है तो अपने बाल काले करना बंद कर दो। उसके बाल व दाढ़ी दोनों ही सफेद है इसलिए उसे बुजुर्ग होने का लाभ मिलता है। 

यह बात अलग है कि अक्सर सुशील मुझे अपनी सीट पर बैठा देता है और खुद खड़ा होकर यात्रा करता है उसे विश्वास होता है कि उसके लिए कोई युवा पुनः अपनी सीट खाली कर देगा। अगर आप मेट्रो में यात्रा करने वालो को देखे तो लगेगा कि काश हमारे देश का हर नागरिक इतना सभ्य व अनुशासित होता। उसे स्वच्छता इतनी पसंद होती तो यह देश स्वर्ग बन जाता। मगर वहीं मेरा अनुभव रहा है कि ये सारे संस्कार मेट्रो स्टेशन में घुसने से लेकर उसमें सफर करने तक ही सीमित रहते हैं। अपने गंतव्य पर पहुंच कर जब किराया चुकाने के लिए यात्री मशीन पर अपना कार्ड लगाकर पैसे कटवाता है तो उसके साथ ही उसके सारे संस्कार भी कट जाते हैं। 

वहां से बाहर निकलते समय वह फिर आम नागरिक हो जाता है। नोएडा सेक्टर-15 के स्टेशन के नीचे उतरते ही आपको जिस तरह से गदंगी व मारामारी देखने को मिलेगी वह बताती है कि सब कुछ ऊपर ही छूट चुका है। सच में मेट्रो में सफर करना तो मानो गंगा में डुबकी लगाने जैसा है। किसी ने कहा था कि यह सच है कि जब हम गंगा में डुबकी लगाते है तो हमारे सारे पाप हमसे दूर हो जाते हैं मगर पानी से बाहर आते ही वे पुनः हमसे चिपट जाते हैं। ऐसे में अक्सर यह सोचने को बाध्य हो जाता हूं कि क्या मेट्रो सभ्यता को उसके बाहर हम व्यवहार में क्या नहीं ला सकते है?

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