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आतंक पर भारत व इजराइल का फर्क!

भारत और इजराइल दोनों ही अपने पड़ौसी देशों द्वारा प्रायोजित आतंकवाद का शिकार होते रहे हैं। आतंकवाद से मुकाबला करना दोनों ही देशों की सर्वोच्च प्राथमिकता रही है। मगर इससे लड़ने के लिए जरूरी दोनों की इच्छा शक्ति व सामर्थ्य में जमीन आसमान का अंतर रहा है।  संचार क्रांति के बाद हुए 1999 के आईसी-814 के विमान अपहरण के दौरान हमने यह साबित किया था कि आतंकवादियों से निपटने में हम लल्लू देश है। अपनी जमीन अमृतसर में अपह्त विमान के उतारे जाने के बाद भी कार्रवाई करना तो दूर रहा हम आतंकवादियों को उसे वहां से पुनः उड़ा ले जाने से रोकने में नाकाम रहे, वहीं इजराइल ने 40 साल पहले बिना जीपीएस, आधुनिक संचार तकनीक की मदद से किसी अन्य देश में खड़े अपह्त विमान से न केवल अपने 66 नागरिको समेत 106 यात्रियो को छुड़ा लाने में सफलता हासिल की थी बल्कि उसके महज एक कमांडों ने अपनी जान गंवाई थी। 

उस आपरेशन के दौरान चार बंधक व सभी छह आतंकवादी व 24 युगांडा के सैनिक मारे गए थे। इस आपरेशन को कामयाब बनाने वाले कमांडों का नाम योनातन (योनी) नेतन्याहू था जोकि मौजूदा इजरायली प्रधानमंत्री बेजामिन नेतान्याहू के बड़े भाई हैं। यह महज संयोग कहा जाएगा कि जब 4 जुलाई 2017 को इजराइल की यात्रा पर गए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने भाषण में उनके भाई की शहादत का जिक्र किया। वह दिन था जब 40 साल पहले 4 जुलाई 1976 को अपह्त विमान के सभी यात्रियों व कर्मचारियों को इजराइल ने छुड़ा लिया था।

27 जून 1976 को एयर फ्रांस का विमान तेल अबीव से 247 यात्रियों व 12 क्रू सदस्यो को लेकर पेरिस की उड़ान पर जा रहा था। एथेंस से उड़ते ही उसका अपहरण कर लिया गया। अपहरणकर्ता फिलिस्तीन व जर्मन के आतंकवादी संगठनों से जुड़े थे। फिलिस्तीन संगठन का नाम पापुलर फ्रंट फार लिबरेशन ऑफ फिलिस्तीन था। आतंकवादियों ने ऐलान किया कि अब इस जहाज को हाफिया-1 के नाम से पुकारा जाएगा। 

उन्होंने बंधको की रिहाई के बदले में विभिन्न देशों में कैद 53 फिलिस्तीनियो को छोड़े जाने की मांग की। वे विमान को बेनगाजी लीबिया ले गए जहां उन्होंने एक महिला को इसलिए छोड़ दिया क्योंकि उसका कहना था कि उसे गर्भपात हो गया था। बाद में पता चला कि वह तो गर्भवती तक नहीं थी। रिहा होने के लिए उसने यह चाल चली थी। कई घंटों की उड़ान के बाद यह विमान युगांडा के एंटीबी हवाई अड्डे पर उतरा व यात्रियो को उतार कर साथ के टर्मिनल भवन में ले जाया गया। उस समय युगांडा पर खूंखार तानाशाह ईदी अमीन का शासन था जिसका तख्ता पलटने के बाद उसके घर के फ्रिज से इंसानी सिर मिले थे। वह इंसानी दिमाग खाता था। 

उसे इजराइल में ही सैनिक प्रशिक्षण मिला था। वो इजराइली वायुसेना का मैडल भी अपनी कमीज पर लगाता था। जिन अफसरो ने ईदी अमीन को प्रशिक्षित किया था उन्होंने उससे संपर्क किया और कहा कि अगर वह इन बंधको को छुड़वा देता है तो उसे शांति का नोबल पुरस्कार दिलवाया जाएगा। इस टर्मिनल के भवन का निर्माण एक इजराइली बिल्डर ने किया था। उसने  सरकार को उसका नक्शा उपलब्ध करवा दिया। रणनीति बनाने वालों को पता चल गया था कि आतंकवादियों की संख्या चार है वे यह भी जान चुके थे कि उन्हें ईदी अमीन का समर्थन व सहयोग हासिल था। 

पहले यह तय किया गया 6 इजराइली कमांडो केन्या पहुंचेगे व वहां से मोटर बोट में सवार होकर हवाई अड्डे से फर्स्ट लेक विक्टोरिया पहुंचेगे और फिर अपनी कार्रवाई को अंजाम देंगे। मगर मोसाद ने सूचना दी कि केन्या इस सब में सहयोग देने के लिए तैयार नहीं होगा। इजराइल ने एक और तो आतंकवादियों को बातचीत में उलझाए रखा और दूसरी और अपनी तैयारियां जारी रखी। इस बीच आतंकवादियों व ईदी अमीन के बीच बातचीत चलती रही। 

उसकी सलाह पर उन्होंने इजराइली बंधकों को छांट कर अलग कर दिया और बाकी को छोड़ दिया। वे लोग पेरिस चले गए। हिटलर के शासन के दौरान हुए नरसंहार से बचे दो यहूदी भी इन बंधकों में शामिल थे। अब 94 बंधक व दर्जन भर विमान के क्रू के कर्मचारी बचे थे। इजराइली योजनाकारों को पता चला कि ईदी अमीन छुट्टी मनाने मारीशस जा रहा है। उन्होंने तय किया कि चार हरकुलिस विमान एंटेबी हवाई अड्डे पर उतरेंगे। उनमें से ईदी अमीन द्वारा इस्तेमाल की जाने वाली मर्सीडीज कार व मोटर साईकिल सवार भेजे जाएंगे जोकि युगांडा के सैनिको की यूनीफार्म पहने होंगे। वहां के रक्षक इस भ्रम में होंगे कि ईदी अमीन वापस लौटा है। 

ईदी अमीन काली कार इस्तेमाल करता था। मगर इजराइलियो ने जो कार जुटाई थी वह सफेद थी इसलिए उस पर काला पेंट किया गया। अंततः पूरी तैयारी करने के बाद योनी नेतन्याहू के नेतृत्व में कमांडो रवाना हुए। वे चार हरकुलिस विमानों में सवार थे व उनके साथ दो बोइंग 707 विमान पोर्थ एक विमान को कमांड पोस्ट में व दूसरे को अबसरवाल में बदला गया था। राडार पर न पकड़े जाने के लिए विमान ने महज 35 फुट की ऊंचाई पर उड़ान भरी। आठ घंटे की उड़ान के बाद देर रात विमान एंटेबी हवाई अड्डे पर उतरा उससे मर्सीडीज गाड़ी निकल कर टर्मिनल की ओर बढ़ी। उन्हें पास आता देखकर युगांडा के सैनिको ने अपनी रायफल ऊंची की। 

योनी नेतन्याहू को लगा कि वह उन्हें रोकना चाहता था अतः उन्होंने उसे साइलेंसर लगी पिस्तौल से गोली मार दी। तब दूसरे जवान ने अपनी एके-47 चलाई। उसे भी ढेर कर दिया गया। फिर तो दोनों और से गोलियां चलने लगी। योनी अपने साथियों के साथ कार छोड़कर टर्मिनल भवन में घुसे। उनका एक साथी मेगाफोन पर अंग्रेजी व हिब्रू में चिल्लाने लगा कि जमीन पर लौट जाओ। सेना तुम्हें बचाने आ चुकी है। करीब आधे घंटे तक चले इस आपरेशन में सारे आतंकवादी व 25 युगांडा सैनिक मारे गए। एयर ट्रैफिक कंट्रोल से चली एक गोली ने योनी की जान ले ली। 

उसके बाद उसके शरीर व सभी बंधकों को लेकर विमान वहां से रवाना हो गया। बेंजामिन को अपने बड़े भाई के न रहने की जब खबर मिली तो उस समय वे अमेरिका में पढ़ाई कर रहे थे। उनके पिता भी वहां पढ़ाते  थे। बाद में योनी के सम्मान में इस आपरेशन का नाम आपरेशन योनाटन रखा गया। इसमें कोई दो राय नहीं है बेंजामिन को अपने भाई की शहादत का अपनी राजनीति में बहुत फायदा मिला। योनी रातोंरात राष्ट्रीय नायक बन चुके थे। उनके परिवार ने उनकी याद में अमेरिका में संस्थान स्थापित किए व बेंजामिन ने मार्केटिंग व बिजनेस की पढ़ाई और कैरियर छोड़कर राजनीति और डिप्लोमेसी में सक्रिय हुए। वे अमेरिकी अंदाज में अंग्रेजी बोलते थे देखने में काफी स्मार्ट थे इसलिए वे इजराइल में शासको की नजर में आए व 1982 में उन्हें अमेरिका स्थित इजराइल के दूतावास में नंबर दो अफसर बना दिया गया। 

वे 14 साल बाद इजराइल के प्रधानमंत्री बने। वे आज भी यह कहते नहीं थकते हैं कि वे जो कुछ है उसमें एंटेबी आपरेशन की बहुत बड़ी भूमिका है। मुझे अपने भाई की शहादत का लाभ मिला। इस घटना के बाद पीएलओ ने कभी भी किसी विमान का अपहरण नहीं किया। वह आपरेशन ईदी अमीन के खिलाफ माहौल बनाने में भी सहायक साबित हुआ व तीन साल बाद उसका तख्ता पलट दिया गया। जब 1980 में ईरान ने अमेरिकी दूतावास में 52 लोगों को बंधक बनाया तो तत्कालीन राष्ट्रपति जिमी कार्टर ने शिमोन पेरेज की सलाह लेकर उन्हें छुड़ाने की तैयारी की हालांकि वे इसमें असफल साबित हुए व अमेरिकी विमान टकरा कर नष्ट हो गए। फिर दुनिया में यह कहा जाने लगा कि इजराइल ने तो वो कर दिखाया जो कि अमेरिका भी नहीं कर सका।

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