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तमिलनाडु की राजनीति सबसे अलग

विवेक सक्सेना
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उत्तर-पूर्व  के तीन राज्यों के नतीजो ने सोचने के लिए बाध्य कर दिया है कि क्या निकट भविष्य में भाजपा का कमल दक्षिण भारत में भी खिलेगा? चंद माह बाद कर्नाटक में चुनाव है। देश के आजाद होने के बाद कर्नाटक में महज एक बार भाजपा की सरकार बनी थी और फिर उसके ऐसे कारनामे हुए कि उसके मुख्यमंत्री बीएस येद्दीयुरप्पा को जेल जाना पड़ा। वे पार्टी छोड़ गए हालांकि अब वापस आ चुके है और दोबारा मुख्यमंत्री पद के लिए उम्मीदवार है। 

अतः भाजपा के लिए दक्षिण भारत में सरकार ठीक वैसी ही रही है जैसे कि मेरे लिए उर्दू की किताब। दक्षिण भारत के प्रमुख राज्यों तमिलनाडु ने भाजपा को कभी घास नहीं डाली। तमिलनाडु की राजनीति सबसे अलग रहती आई हैं। एक समय था जब वहां देश के दूसरे हिस्सों की तरह ही कांग्रेंस का बोलबाला था। तब अविभाजित इस राज्य को मद्रास एस्टेट कहा जाता था। शायद यही वजह है कि आज भी हर दक्षिण भारतीय को मद्रासी कहा जाता है और यह माना जाता है कि वह तो इडली, डोसा, सांभर ही खाता होगा। 

यह राज्य ऐसा रहा हैं जहां 50 दशकों से भाजपा तो क्या कांग्रेंस तक सत्ता बनाना तो दूर उसके करीब आने से तरसती आई हैं। तमिलनाडु की राजनीति एकदम अलग है। सच कहा जाए तो तमिलनाडु को देश के मूल निवासियों द्रविडो का ही राज्य माना जाता रहा है। जब ये लोग वृहद मद्रास में रहते थे तो तमिल, तेलगू, मलयालम, तेलगू, कन्नड़ आदि भाषाएं बोलते थे। 

ऐसा माना जाता है कि आदि मूलवासी 50,000 साल पहले से आ कर यहां बसे थे। मोहनजोदड़ो व सिंधु घाटी की सभ्यता भी उन्हीं की देन थी। उनका रंग व बाल काले थे। माथा व आंखें बड़ी होती थी। बताया जाता है कि ईरान व दक्षिणी रूस से आए गोरे आर्यो ने उन पर हमला किया तो मूलतः शांत स्वभाव के ये लोग उनके आश्रित हो गए। 

यहां यह ध्यान दिलाने वाली बात है कि दुनिया का सबसे बड़ा तानाशाह हिटलर भी खुद को आर्य कहता था व उसका चुनाव चिन्ह ठेड़ा साखिया (सतिया) था। वरना एक ही भौगोलिक हालत में रहने वाले दक्षिण के ब्राह्मण उत्तर के ब्राह्मणों की तरह गोरे चिट्टे व पढ़े लिखे विद्वान कैसे होते?  उनके संस्कार व आदतें जैसे संस्कृत का ज्ञान व शाकाहार एक जैसा ही था और है। ब्राह्मणों व गैर-द्रविड द्वारा उनकी अनदेखी व शोषण किए जाने की भावना ने 1925 में जोर पकड़ा। ई वी रामास्वामी पेरियार ने 1925 में सामाजिक बराबरी के मुद्दे पर आंदोलन आरंभ किया। उन्होंने इसे स्व इज्जत आंदोलन का नाम दिया।

उन्होंने संस्कृत, हिंदू धर्म व वैदिक संस्कृति को छोड देने पर जोर दिया। उन्होंने बाकी लोगों को आर्य बताते हुए उत्तर भारत की उपनिवेशवाद नीति और ब्राह्मणों से निजात पाने का आवाह्न किया। जस्टिस पार्टी बनी व उसमें गैर-ब्राह्मण व पैसे वाले उच्च वर्ग व जमींदार शामिल हुए। वे अपने शासन की बात करते थे। उन्होंने 1944 में इसे द्रविड कडगम में बदल दिया जोकि आज द्रविड मुनेत्र कडगम व ऑल इंडिया द्रविड मुनेत्र क़डगम कहलाती है। वहीं पूरे देश में आंदोलन के रूप में छाई कांग्रेंस ने 1937 में वहां हिंदी को अनिवार्य घोषित कर दिया। 

पेरियार तब कांग्रेंस की नीतियों को ब्राह्मणों व बनियों का जाल कहा करते थे जोकि पिछले लोकसभा चुनाव तक भाजपा के बारे में कहा जाता था। उन्होंने द्रविडो के लिए आजाद देश द्रविड नाडू को कहा। आजादी के बाद वहां भी कांग्रेंस छाई रहीं। तब सी राजगोपालचारी वहां के मुख्यमंत्री बने। उन्होंने जो शिक्षा नीति लागू की इससे इस भावना ने जोर पकड़ा कि वे पुरानी जाति व्यवस्था लागू करने की कोशिश कर रहे हैं। 

मालूम हो कि देश के पहले गवर्नर-जनरल राजाजी ब्राह्मण थे और उनकी बेटी ने महात्मा गांधी के बेटे से शादी की थी जोकि बनिया थे। इसलिए पेरियार ने उत्तर भारतीय कांग्रेंस को बनिए-ब्राह्मणों का शासन लाने वाली पार्टी कहा था।

उनकी जगह कांग्रेंस ने के कामराज को मुख्यमंत्री बनाया। हालत काफी कुछ संभले मगर जब उन्हें पार्टी अध्यक्ष बनाकर दिल्ली भेजा गया तो हालत गड़बड़ा गए। राज्य में उत्तर भारतीयों, संस्कृत हिंदी ब्राह्मणों का विरोध बढ़ने लगा। जब सरकार ने हिंदी को राजकाज की भाषा घोषित किया तो यह आंदोलन उग्र हो गया। गणतंत्र दिवस के महज 1 दिन पहले 25 जनवरी 1965 को छात्रों ने मद्रास में जुलूस निकाला। जब वह कांग्रेंस दफ्तर के सामने से निकला तो वहां अगले दिन के लिए सजाए गए मंच पर तोड़-फोड़ की गई। बदले में कांग्रेंसियों ने प्रदर्शनकारियों को मारा। 

इसके बाद राज्य में दो माह तक हिंसक आंदोलन चला। इसमें 300 लोग व दो पुलिस वाले मारे गए। देश में भुखमरी व सूखे का आलम था। लोग कांग्रेंस के खिलाफ हो गए व 1967 में कांग्रेंस को पहली बार असली चुनावों का सामना करना पड़ा। वहां की 25 में से 23 लोकसभा सीटों पर द्रमुक जीती व दो सीटे मुस्लिम लीग के साथ गई। तत्कालीन मुख्यमंत्री के कामराज एक नए छात्र से चुनाव हार गए। द्रमुक को विधानसभा चुनाव में दो-तिहाई बहुमत हासिल हुआ। 

द्रमुक नेता एम करूणानिधि ने 1952 में अपनी फिल्म पराशक्ति में ब्राह्मणवाद, जाति व्यवस्था व उत्तर के विरोध को लेकर कहानी लिखी थी। तब से ब्राह्मण इन सबके विरोध में फिल्मे बनाई जाने लगी। उत्तर विरोध भावना तेज होती गई। पहले द्रमुक मुख्यमंत्री सी एम अन्नादुरै ने शादियों के नए तरीके व सस्ते चावल व मिड डे मील की शुरुआत की थी। जिसकी देखा-देखी आज देश के हर राज्य में वहीं हो रहा है। बाद में द्रमुक का विघटन हो गया और एमजी रामचंद्रन ने अन्नाद्रमुक बनाई। तब से लेकर आज तक बारी-बारी से ये दो दल वहां शासन करते आए हैं।

वहां सिनेमा ने सामाजिक आंदोलन की जगह ली। वे सामाजिक न्याय व ब्राह्मण विरोध की बात करते थे। एमजी रामचंद्रन, एसएस राजेहर, शिवाजी गणेशन, एमआर राधा सरीखे नेता इसके मशाल वाहक बने। 1977 में अलग पार्टी बनाकर चुनाव लड़ने वाले मरूधर गोपालन रामचंद्रन (एमजीआर) देश के पहले अभिनेता मुख्यमंत्री बने। वे अपने जीते-जी 1987 तक कोई चुनाव नहीं हारे और वे तीन बार लगातार चुनाव जीते। उनके मरने के बाद अन्ना द्रमुक उनकी पत्नी जानकी व सहेली जयललिता की पार्टी में बंट गई। हालांकि बाद में जयललिता की अगुवाई वाला धड़ा ही असली साबित हुआ। उन्होंने उन्हें राज्यसभा में दल का नेता व प्रवक्ता बनाया हुआ था। 

जयललिता बहुत अच्छी हिंदी बोलती थी मगर राजनीतिक कारणों से उन्होंने कभी भी सार्वजनिक रूप से हिंदी नहीं बोली। मिड डे मील उनकी पहल से ही शुरू की गई थी। जयललिता सत्ता में रहते हुए जेल जाने वाली पहली मुख्यमंत्री साबित हुई। तमिलनाडु की राजनीति में चेट्टियार (बैंकट) थेवर, नादर मुदलियार, गाउंडर, वानियार जातियों का बोलबाला रहा है। पी चिदंबरम चेट्टियार है जबकि सब पिछड़ी जाति की जातियां हैं। इसका वहां की जनसंख्या में हिस्सा 68 फीसदी है। अन्ना द्रमुक में थेवर जाति का बोलबाला है। जयललिता के न रहने व एम करूणानिधि के लगभग 95 साल का हो जाने के बाद पहली बार वहां अभिनेताओं से मुक्त विधान सभा चुनाव होगी। क्या गजब का संयोग है कि ब्राह्मण होने के बावजूद जयललिता ने वहां राज किया। अब एक और ब्राह्मण नेता कमल हसन ने अपनी पार्टी बना ली है। देखना यह है कि द्रमुक राजनीति वाले इस राज्य के लोग आगे कहां व किसके साथ जाते हैं।

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