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इच्छामृत्यु

विवेक सक्सेना
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अमेरिकी राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन से एक बार किसी ने पूछा कि पैर कितने लंबे होने चाहिए? उन्होंने जवाब दिया कि सिर्फ इतने लंबे कि जमीन तक पहुंच जाएं। उनकी यह बात मुझे तब याद आ गई जब पिछले दिनों देश की सर्वोच्च अदालत ने इच्छा मृत्यु के बारे में अपना फैसला सुनाया। देश के जाने-माने एनजीओ कॉमन कॉज द्वारा दायर इस मामले में यही अपील की गई थी कि हर इंसान को यह अधिकार होना चाहिए कि वह तब तक ही जीवित रहे जब तक कि वह जिंदा रहना चाहता है। 

संगठन ने इसकी कई वाजिब वजहें बताई थीं। जैसे कि कुछ लोग बुढ़ापे में तमाम बीमारियों के कारण लगभग घिसटते हुए लंबी जिंदगी बिताते हैं। वे आईसीयू सरीखी जगहों में अप्राकृतिक संसाधनों जैसे कि आक्सीजन के जरिए अपनी जिंदगी बिताते हैं। उनके शरीर में लेटे-लेटे फोड़े हो जाते हैं। उन्हें तो यह पता भी नहीं पड़ता कि उनके साथ क्या हो रहा है। 

एक परिचित थे जिनकी बीमार सास उनके साथ रहती थी और उन्होंने उनकी 10-15 साल तक सेवा की। एक बार तो उन्होंने मुझे बताया कि आज बड़ा डर लग रहा है क्योंकि जब मैं सुबह उठा तो मैंने पाया कि मेरी सास के शरीर पर चीटिंया रेंगते हुए उन्हें जीवित खा रही थीं। यह कोई अच्छा संकेत नहीं है। संयोग की बात है कि उन्होंने दवा छिड़क कर चीटियों को भगा दिया मगर उनकी सास इस घटना के अनेक साल बाद भी जीवित रहीं। हम में से न जाने कितने लोगों को इस तरह स्थिति से गुजरना पड़ता है।

जरा अपने आस-पास देखें तो पता चलेगा कि न जाने कितने लोग इस हालात से गुजर रहे हैं जिन्हें पता ही नहीं कि उनके साथ क्या हो रहा है? कभी दिल्ली के मुकुटविहीन राजा कहे जाने वाले हरकिशन लाल भग्त अपने जीवन के अंतिम दिनों में एक बार जैड सिक्योरिटी के साथ पंडारा पार्क में टहलते हुए मिले। उन्होंने पता नहीं कैसे यह पहचान लिया कि मैं पत्रकार हूं। वे लगभग चिल्ला कर कहने लगे कि तुम्हें याद है ना कि एक समय था जबकि बड़े से बड़े लोग भी मुझसे मिलने का समय मांगा करते थे। इंदिरा गांधी के बाद मैं इस देश का सबसे अहम व्यक्ति था। आज कोई नहीं आता। 

उनके साथ के सुरक्षाकर्मी कभी मेरा चेहरा देखते तो कभी उनका। उन्होंने कातर आंखों से मुझसे उनसे पीछा छुड़ाने के लिए कहा और मैंने उनसे इजाजत ली। यही हालत कभी भाजपा के सबसे मजबूत मुख्यमंत्रियों में गिने जाने वाले नेता मदनलाल खुराना की हुआ करती थी। जैन डायरी में उनका नाम आने पर उन्होंने दिल्ली के मुख्यमंत्री का पद छोड़ा और फिर कभी नहीं उबरे। बीच में तो वे भाजपा छोड़कर चले गए थे। बताते हैं कि अपनी अंतिम यात्रा के समय तिरंगे झंड़े में शव के लिपटा होने की इच्छा जताने वाला यह नेता आज जिस हालत में है उसे अंग्रेंजी में ‘वैजीटेबल स्टेट’ कहते हैं। मतलब यह कि न तो वह उठ सकता है न कुछ समझ सकता या खुद दवा पी सकता है। 

आज सिर्फ उनकी बात ही क्यों की जाए? इस देश के पूर्व प्रधानमंत्री और इंदिरा गांधी के बाद देश के एकमात्र तीन बार प्रधानमंत्री बनने वाले अटल बिहारी वाजपेयी अलजाइमर रोग से पीडित है जिसमें यह समझ में ही नहीं आता कि कहां क्या हो रहा है। जब कुछ साल पहले उन्हें भारत रत्न से सम्मानित किया गया तो तत्कालीन राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी उन्हें सम्मानित करने के लिए उनके घर गए व इस कोण से पीआईबी ने तस्वीर खींची कि न तो उनका पूरा चेहरा आए और न ही उन्हें बैठा हुआ देखा जा सके। 

पूर्व रक्षा मंत्री जार्ज फर्नाडीज की ऐसी ही हालत है। पूर्व केंद्रीय मंत्री मुरोसोली मारन व प्रियरंजन दास मुंशी दशकों तक इस हालत से गुजरे। दासमुंशी के घर वाले तो उन्हें घर में रखने के लिए तैयार नहीं थे। अतः उन्हें सरकारी खर्च पर निजी अस्पताल में रखा गया। वहीं इस देश में राम जेठमालानी (94) वैजयंती माला (83 साल) लेखक रस्किन बांड (83 साल) सरीखे लोग भी है जो इतनी आयु में प्रसन्नचित होकर जी रहे हैं। 

अदालत का जो फैसला है वह जवाब से ज्यादा सवाल उठाता है जिसके लागू होने पर संदेह ज्यादा नजर आता है। मुझे अपने को लेकर एक कहानी नजर आती है एक बार किसी भक्त ने भगवान की काफी पूजा की और उससे खुश हो ईश्वर ने उससे वर मांगने को कहा। उसने कहा कि बस इतना ही वर देना कि मारने के पहले मुझे बता देना। वह एक दिन मर गया और ऊपर पहुंच कर ईश्वर से लड़ने लगा कि तुमने मुझे नहीं बताया। इस पर भगवान ने उससे मुस्कुराते हुए कहा कि गलती मेरी नहीं तुम्हारी है। मैंने तो तुम्हे डायबिटीज देकर, दिल का आपरेशन न करवा कर बदन सफेद करके बार-बार तुम्हे यह संकेत दिए थे मगर तुम्हारी समझ में ही न आए तो मैं क्या करता।

मैंने बचपन से यह देखा है कि हम लोग मौत को बहुत बुरी चीज मानते हैं। किसी भी आत्मीय या सर, मैडम के मरते ही उनके प्रति हमारा रूख बदल जाता है वे बॉडी हो जाते हैं। उनके बारे में पूछा जाने लगता कि बॉडी का अंतिम संस्कार कब होगा। एक बात आज तक मेरी समझ में नहीं आई कि फोटोग्राफी के बेइंतआ शौक रखने वाले लोग चाहे वह  किसी भी धर्म या जाति के क्यों न हो अपने किसी परिचित के पार्थिव शरीर, अंतिम यात्रा या अंतिम संस्कार की फोटोग्राफी क्यों नहीं करवाते हैं? 

दिल्ली के एक पान विक्रेता इसके अपवाद थे जिन्होंने मृत्यु को एक पर्व बताते हुए बैंड बजवाने के साथ अपनी अंतिम यात्रा निकलवाई। मेरे एक परिचित पत्रकार रोज पीते थे। सुबह हनुमान मंदिर जाते व पीने तक उनका टीका लगा रहता था। एक दिन जब प्रेस क्लब गया तो पता चला कि वे बीती राज गुजर गए। पीकर घर पहुंचे। देर रात सीने में दर्द हुआ व इसके पहले की उन्हें अस्पताल ले जाया जाता वे दुनिया में नहीं रहे। बिना किसी को परेशान या परिवार का एक भी पैसा खर्च करवाए बिना ही दुनिया छोड़ गए। 

मैं बचपन से अब तक काफी बीमार रहा। मेरे मां-बाप अपने अंतिम दिनों में बीमार रहे। पिताजी का तो कार एक्सीडेंट हुआ वे लंबे अरसे तक बिस्तर पर रहे। मगर मां कहती थी कि भगवान ऐसी मृत्यु देना कि मैं किसी पर आश्रित न हूं व मुझे किसी से सेवा न करवानी पड़े। उन्हें दिल का दौरा पड़ा। अस्पताल में उन्हें ले जाया गया। अगले दिन एम्स ले जाते समय उसके रिसेप्शन पर ही उन्होंने प्राण त्याग दिए। मुझे भी भगवान ने काफी झटके दिए है फिर भी मेरी एकमात्र चाहत यही है कि वह मुझे एक झटके में वापस बुलाए। बूढ़ा हो, बच्चा हो अथवा जानवर उसे तभी तक जीवित रहना चाहिए जब तक कि वह अपने बलबूते पर अपने सारे कामकाज कर सके।

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