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खुराफात यूं ही नहीं की जाती

जब पूरा देश पद्मावतीमय हो रहा हो तब मैं इस विषय पर अपनी कलम न घिंसू यह कैसे हो सकता है? सच्चाई यह है कि मैंने इतने दिनों तक इसके संबंध में कुछ भी इसलिए नहीं लिखा क्योंकि मुझे कभी इतिहास में जरा भी रूचि नहीं रही। खासतौर से तारीखों से मेरी पुरानी दुश्मनी है। सच कहूं तो मुझे अपनी जन्मतिथि व देश आजाद होने के अलावा शायद ही कोई ऐसी तारीख होगी जो कि याद रहती हो। 

मुझे तो यह भी नहीं याद रहता है कि अकबर, शाहजहां, बाबर, जहांगीर आदि में से कौन किस का पिता, बेटा पोता था। हालांकि मैंने पद्मावती का नाम बचपन में ही सुन रखा था। किसी ने मुझे एक किताब ‘ज्ञान सागर’ भेंट की थी जिसमें तमाम विषयों की जानकारी के अलावा कुछ कहावते व मुहावरे आदि भी दिए थे। इनमें से एक मुझे हमेशा याद रही जो कि कुछ इस प्रकार थी कि गढ़ तो चित्तौड़गढ़ और सब गढ़ैयां, रानी तो पद्मावती और सब गधैयां। जब पिछले साल घूमने के लिए उदयपुर जा रहा था तो एक दिन भीलवाड़ा में व्यासजी के घर बिताने के बाद दूसरे दिन जब रवाना होने लगा तो वहां रहने वाले व नया इंडिया के पाठक लोकेश व्यास मुझसे चित्तौडगढ़ किला देखने का अनुरोध करने लगे। उनकी बात सुनकर बचपन में पढ़ी वह कहावत याद आ गई और पद्मावती की याद को ताजा करते हुए किले में गया। 

वहां जा कर वह जगह भी देखी जहां पद्मावती की कथित तौर पर बैठक थी व उनका अक्स नीचे पानी के तालाब में दिखाई दिया था। जब हाल ही में संजय लीला भंसाली की फिल्म पद्मावती के प्रदर्शन पर रोक लगाए जाने की मांग को लेकर आंदोलन और प्रदर्शन शुरू हुए तो सोचा कि क्यों न इस बारे में और जानकारी हासिल की जाए? मगर जब यह पढ़ा कि यह सब कुछ तो मलिक मोहम्मद जायसी की रचना पद्मावत को लेकर हो रहा है और उस हवाले अभी तक जो कुछ इतिहासकारों ने लिखा है उसे पढ़ कर यह बता पाना बहुत मुश्किल है कि वास्तव में पद्मावती की अपनी कहानी क्या थी और भंसाली ने उसे किस रूप में प्रस्तुत किया? 

फिर अचानक एक दिन अपने डा. वेदप्रताप वैदिक को रजत शर्मा के साथ चैनल पर देखा जिसमें उन्हें यह कहते दिखाया गया था कि फिल्म में कुछ भी ऐसा आपत्तिजनक नहीं है जिसके लिए विरोध प्रदर्शन किए जाए। इसके साथ ही रजत शर्मा यह कहते नजर आए कि अपने इस खुलासे के बाद यह आंदोलन प्रभावित हुआ है व बहुत जल्दी ही ठंडा पड़ जाएगा। हालांकि वैसा कुछ हुआ नहीं। उन्होंने जिस तरह से फिल्म को सर्टिफिकेट जारी करने का ऐलान किया वह मेरी समझ से परे था क्योंकि आमतौर पर वे जो कुछ कहते करते या दिखाते है वह मोदी सरकार की सोच को प्रस्तुत करता है। दूरदर्शन भी सरकार की सोच व विचारों को इतनी खूबसूरती से पेश नहीं कर सकता जितनी योग्यता से वे ऐसा करते हैं। उनकी अदालत का हर फैसला मोदी सरकार के हक में ही होता है। अरनब गोस्वामी, रजत शर्मा आदि तो सरकार के महंत सेवादास व जत्थेदार रछपाल सिंह माने जाते हैं। 

अतः उन्होंने इस फिल्म का समर्थन कैसे कर दिया यह अपनी समझ से बाहर है क्योंकि सरकार जो कुछ कर रही है उससे तो यही लगता है कि पूरा मामला गुजरात विधानसभा चुनाव तक माहौल गरमाए रखने का है ताकि हिंदू-मुस्लिम टकराव का माहौल बना रहे और उसकी हवा में हार्दिक, जिग्नेश से लेकर कांग्रेंस तक सभी साफ हो जाएं। जो लोग यह सोचते होंगे कि भाजपा के पास ले-देकर सिर्फ राम मंदिर ही है, यह उन लोगों की बहुत बड़ी भूल हैं क्योंकि पार्टी तो शौचालय, कब्रिस्तान, लव-जेहाद से लेकर पद्मावती तक के मुद्दे पर हिंदू मतदाता को अपने पक्ष में रिझाने की कुव्वत रखती है। तभी उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने यह बयान देते हुए अपने राज्य में फिल्म के प्रदर्शन पर रोक लगा दी है कि जितना नाक काटने या सिर काटने का बयान देने वाले दोषी है उतना ही दोषी वे लोग भी है जिन्होंने यह फिल्म बनाई है। 

मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराजसिंह ने तो दो कदम बढ़ कर पद्मावती को राष्ट्रमाता की उपाधि दे डाली। पंजाब की कैप्टन अमरेंद्र सिंह सरकार को छोड कर किसी भी गैर-भाजपाई मुख्यमंत्री ने इस प्रदर्शन के खिलाफ कुछ नहीं कहा है। वैसे अगर प्रेस क्लब व मीडिया सेंटर में होने वाली गपशप पर विश्वास किया जाए तो यह सब पूरी तरह से प्रायोजित है। इस फिल्म में देश के एक बहुत बड़े उद्योगपति का पैसा लगा हुआ है। जोकि सही अर्थो में ‘राजपूत’ रहा है। मतलब यह कि जिसका राज होता है वह उसी का पूत बन कर उसकी गोद में बैठ जाता है। 

यही वजह है कि सरकार ने अभी तक इस फिल्म पर प्रतिबंध नहीं लगाया है। विरोध, प्रदर्शनों और चैनलों पर होने वाली बहसों से फिल्म को जो प्रचार मिल रहा है उसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती है। बाहुबली के प्रचार पर जितना खर्च किया गया था उसके सामने तो यह एक फीसदी भी नहीं है।

यह सच है कि राजस्थानी लोग खासतौर पर राजपूत अपनी आन-बान शान के लिए कुछ भी कर सकते हैं। जौहर शब्द भी यही का दिया हुआ है। जब शत्रु आक्रमण करता था और यह लगता था कि उससे जीत पाना संभव नहीं होगा तो सभी राजपूत पुरूष अपने सिर पर साफा बांध कर, भगवे कपड़े पहन कर दुश्मन पर टूट पड़ते थे व महिलाएं आग लगा कर खुद को उसके हवाले कर देती थी। 

राजस्थान में नौ जौहर (साफा) हुए हैं। इतिहासकार बताते है कि चित्तौड़गढ़ का जौहर पहला जौहर नहीं था। पहला जौहर तो नरवाड़गढ़ के किले में हुआ था जब महमूद गजनवी की सेना ने उसे घेरा था। तब 20 हजार महिलाए सती हुई थी। सतियो को बहुत आदर की दृष्टि से देखा जाता है व उसकी हैसियत देवी सरीखी हो जाती हे। राजस्थान के अनेक गावों में यह परंपरा है कि नवविवाहित जोड़े को सतियों का आशीर्वाद लेने के लिए उस जगह भेजा जाता है जहां जौहर करने के पहले सती ने अपने हाथों की छाप छोड़ी होती है। 

मौजूदा आंदोलन, श्री राजपूत करणी सेना के अध्यक्ष लोकेंद्र सिंह कालवी के पिता कल्याण सिंह कालवी चंद्रशेखर सरकार में मंत्री थे। उस समय राजस्थान में सती कांड हुआ था जिसकी देश भर में आलोचना हुई थी मगर मंत्री रहते हुए कालवी ने उसका समर्थन किया था। कालवी भी पहले भाजपा में ही थे। उनका व देवीसिंह भाटी का पार्टी से मन उखड़ गया और उन्होंने भाजपा से अलग होकर सामाजिक न्याय मंच बना लिया। इसने 2003 के विधानसभा चुनाव में अपने उम्मीदवार खड़े किए जिसमें से सिर्फ देवीसिंह भाटी ही चुनाव जीते और वे भी बाद में भाजपा में चले गए। 

लोकेंद्र 2008 के विधानसभा चुनाव के पहले कांग्रेंस में चले गए मगर जब उन्हें टिकट नहीं मिला तो वे वापस आ गए। पिछले लोकसभा चुनाव के समय वे भाजपा में थे। बाद में उससे अलग हो गए। आमतौर पर वे वसुंधरा राजे के विरोधी खेमे में रहते आए हैं व इस सेना के इशारे पर कांग्रेंस भी रही है। करणी सेना का नाम राजपूतो की देवी करणी के नाम पर रखा गया है। 

कुछ भी हो पर हमारे देश में खुराफात की भी कीमत होती है। शिवसेना, श्रीराम सेना या बजरंग दल ही नहीं उस सूची में करणी सेना का भी नाम जुड़ गया। वह सभी भारतीय चैनलो पर छाए है। उनकी देखा-देखी हरियाणा के भाजपा नेता सुरेंद्र पाल अमू ने तो दो सिरो के लिए 10 करोड के ईनाम का ऐलान कर चर्चा और प्रचार में कालवी को भी पीछे छोड़ दिया है। अमू, राज्य की राजनीति में अनिल विज के करीबी माने जाते है व उनकी इस बयानबाजी का मतलब मुख्यमंत्री खट्टर को निशाने पर लेना है। विरोध का तंदूर गर्म हो चुका है और रोटियां सेकी जाने लगी हैं।

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