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आजादी की लड़ाई में कुंओं की भूमिका

भारत छोड़ो आंदोलन की 75वीं वर्षगांठ मनाना निश्चित तौर पर गर्व की बात है मगर इसके साथ ही हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि इसकी तह में 1857 की वह क्रांति छिपी हुई थी जिसके जरिए देश में पहली बार अंग्रेंजो (ईस्ट इंडिया कंपनी) के दमनकारी शासन के खिलाफ आवाज बुलंद की गई थी। उस घटना को घटे 160 साल बीत गए हैं मगर हमने उस समय घटी तमाम बेहद अहम घटनाओं को भुला दिया जोकि हमें बताती है कि उस समय भारतवाशियों पर किस तरह से शासन किया जा रहा था।

सच्चाई यह है कि यदि 1857 का विद्रोह नहीं हुआ होता तो शायद देश पर ईस्ट इंडिया कंपनी का ही शासन चलता रहता और ब्रिटेन की राजशाही उसे अपने अधीन लेने की बात भी नहीं सोचती। उस समय घटी घटनाओं और सैनिको की शहादत को लेकर हम लोग कितनी बेरूखी अपना रहे है उसका एक उदाहरण ‘ब्लैक होल आय अजनला कांड से मिलता है। यह घटना 31 जुलाई 1857 को घटी थी। इसे न केवल भुला दिया गया है बल्कि पंजाब व केंद्र की सरकारों ने इसमें शहादत देने वालों का भी पता नहीं लगाया है। शहीदों के पार्थिव शरीर तक खोजने की कोशिश नहीं हुई।

घटना बकरीद के दिन अमृतसर के निकट अजनला शहर के कलियावालां खू में घटी थी। हुआ यह कि जब अंग्रेंजो के खिलाफ बगावत किए जाने की खबर फैली तो लाहौर की मियां मीर छावनी में तैनात 500 भारतीय सैनिको ने भी बगावत कर दी और वे रावी नदी तैरते हुए पार करके अजनाला की और बढ़े। कलियावाला खू का मतलब काले लोगों का कुंआ होता है। अंग्रेजों ने इस कुएं को यह नाम इसलिए दिया था क्योंकि यहां काले भारतीय पानी भरते थे।

अंग्रेजो ने बागी सैनिको पर गोलिया चलाई जिसमें सैकड़ो की तादाद में लोग मारे गए। बाकी 282 सैनिको को गिरफ्तार करके उन्हें बेहद तंग कोठरी में डाल दिया। कुछ दिन बाद अंग्रेजों ने फायरिंग स्क्वैड बनाया और 10-10 की संख्या में निहत्थे बागी सैनिको को उसके सामने खड़ा करके उन्हें गोली से मरवाना शुरू किया। संबंधित अंग्रेंज अफसर ने बड़े गर्व के साथ कहा कि मैंने एक भी गोली बर्बाद नहीं होने दी। काफी तादाद में बागी दम घुटने की वजह से मर गए।

बाद में उनकी लाशों को कलियावाला खू में डाल कर उस पर मिट्टी भर दी गई। इस बारे में लंदन में तो पुस्तके प्रकाशित हुई मगर भारत में कुछ नहीं छपा। अमृतसर के इतिहासकार सुरिंदर कोछर ने इस संबंध में काफी शोध करके इस कुएं का पता लगाया और वे वर्षो तक राज्य सरकार व केंद्र सरकार के पुरातत्व विभाग को इस कांड के बारे मे पत्र लिखते रहे व उनसे सच्चाई का पता लगाने की मांग करते रहे मगर किसी ने इसमें रूचि नहीं दिखाई। अंततः उन्होंने कुछ अपने जैसे लोगों के साथ मिलकर उस कुएं की खुदाई करने का फैसला किया।

तब तक वहां एक गुरूद्वारा बन चुका था। गुरूद्वारा प्रबंधक कमेटी वहां की खुदाई के लिए तैयार हो गई। इसके लिए उस स्थान पर बने गुरुद्वारे को कहीं और स्थानांतरित करना पड़ा। जब यह गुरूद्वारा दूसरी जगह पर बन गया तो सुरिंदर कोछर व उनकी टीम ने उस जगह की खुदाई शुरू की। करीब 23 फुट खोदने के बाद उन्हें वहां 90 खोपडियां, 870 जबडे, 5000 दांत, 70 एक रुपए के सोने के सिक्के मिले। जिन्हें की ईस्ट इंडिया कंपनी ने जारी किया था। इसके अलावा 6 अंगूठिया, चार कड़े व 2 पैडल भी प्राप्त हुए। मगर आज तक वहां ने तो किसी दल का कोई नेता श्रद्धांजली देने गया और न ही सरकार ने इन लोगों की अस्थियों का डीएनए परीक्षण करवाकर उनकी पहचान स्थापित करने की कोशिश की।

यह सोचा गया कि इन लोगों की अस्थियों का अंतिम संस्कार कैसे किया जाए क्योंकि मारे गए शहीदो में मुस्लिम भी शामिल थे व सबकी अस्थियां मिल चुकी थी। इसलिए उन्हें हरिद्वार ले जाकर प्रवाहित कर दिया गया। इन लोगों की हत्या का आदेश देने वाला अंग्रेंज अफसर डिप्टी कमिश्नर फ्रैडरिक कूपर इतना क्रूर था कि उसने कुएं के बाहर तीन भाषाओं – फारसी, गुरमुखी व अंग्रेंजी में लिखवाया था कि ‘बागियों की कब्र’। इस खोज के बाद गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी ने अपने गुरुद्वारे का नाम शहीदावाला गुरूद्वारा रख दिया।

वैसे बताते हैं कि अंग्रेंजो द्वारा इतनी क्रूरता दर्शाने के पीछे इस घटना के कुछ दिन पहले कानपुर में घटा बीबीघर कांड था। जब 1857 में अंग्रेंजो के खिलाफ सैनिको ने विद्रोह किया तो नाना साहब पेशवा भी उन लोगों के साथ हो गए और बागियों ने उन्हें अपना नेता मान लिया। उस समय अंग्रेंज मेजर हग व्हीलर कानपुर का प्रभारी था। उसकी पत्नी भारतीय थी और वह हिंदी अच्छी तरह से बोल लेता था। उसे लगता था कि इन कारणों से यहां के लोग उसके खिलाफ नहीं जाएंगे। उसने अपनी दो टुकडियां विद्रोह दबाने के लिए लखनऊ व इलाहाबाद भेज दी थी।

कानपुर में पेशवा के सैनिको ने अंग्रेंजो के गैरिजन को घेर लिया। उस समय वहां 500 सैनिक व 900 दूसरे अंग्रेंज थे। यह घटना 2 जून 1857 की थी। इससे पहले जब भारतीय सैनिको में वेतन बटा जा रहा था तो उन्हें एक-एक करके बुलाया जा रहा था। यह अफवाह फैलने लगी कि अंग्रेंज भारतीय सैनिको को मारना चाहते हैं। अगले दिन एक अंग्रेंज अफसर काक्स टेरेट ने शराब पीकर एक भारतीय सैनिक को गोली मार दी। सैनिक बच गया। उसी रात अफसर को कैद कर लिया गया। मगर अगले दो दिन ईस्ट इंडिया कंपनी की अदालत ने उसे रिहा कर दिया। इससे काफी नाराजगी पैदा हो गई।

वैसे भी अंग्रेंज शासक भारतीयों के साथ दुर्व्यवहार करते थे। ये लोग पेशवा, रानी लक्ष्मीबाई और बहादुरशाह जफर के साथ किए जाने वाले अंग्रेंजो के बर्ताव से नाराज थे। जब अंग्रेंज घिर गए तो नाना पेशवा ने हग व्हीलर को पत्र लिखकर उन्हें शहर छोड़ कर इलाहाबाद भाग जाने की इजाजत दे दी। जब वे लोग नावों पर सवार हो रहे थे तो बताते है कि किसी ब्रिटिश अफसर की गोली से कोई बागी मारा गया और बदले में बागियों ने उन्हें भून डाला। इससे पहले नाना पेशवा ने औरतों व बच्चों को कानपुर में ही रहने के लिए उन्हें लाने के लिए पालकी, घोडे आदि भेज दिए थे।

इन लोगों की संख्या 150 थी जिन्हें नदी के करीब स्थित एक अंग्रेंज अफसर द्वारा अपनी रखैल के लिए बनवाए घर ‘बीबीघर’ में रख दिया गया। वहां करीब 150 औरते व बच्चे थे। उनकी देखभाल के लिए नाना पेश्वा ने अपनी एक रखैल हुसैनी बेगमा को नियुक्त कर दिया। माना जाता है कि उन्होंने अंग्रेंजो के साथ राजनीतिक मोलभाव करने के लिए इन लोगों को कानपुर में रोक लिया था मगर जब कुछ दिनों बाद अंग्रेंजो ने पुनः कानपुर को घेरा और उस पर कब्जा करने के लिए आगे बढ़े तो हुसैनी बेगम ने वहां मौजूद नाना के सैनिको से उनकी हत्या करने को कहा। उन लोगों ने महिलाओं व बच्चों पर गोली चलाने से इंकार कर दिया। इस पर हुसैनी बेगम ने अपने दोस्त सरदार खान से इसके लिए कहा। उसके लोगों ने इन महिलाओं व बच्चों की निर्ममता से हत्या कर दी। उनके शवों को वहां स्थित एक कुएं में फेंक दिया गया।

कुल 150 लोग मारे गए। अंग्रेंजो ने शहर पर कब्जा करने के बाद जम कर कत्लेआम किया। बताते हैं कि चंद दिनों के अंदर ही 6,000 लोग मारे गए। तमाम बागियो को चौराहों पर फांसी पर लटका दिया गया। बागियों से बीबीघर के खून से लथपथ फर्श को जीभ से चाट कर साफ करने को कहा गया। मुसलमानों के मुंह में सुअर व हिंदुओं के मुंह में गाय का मांस भरने का आदेश दिया गया। हिंदुओं को गाय व मुसलमानों को सुअर की खाल में सिलने का आदेश देते हुए जनरल हैक्टी है ब्लाक ने कहा कि मैं तुम्हें ऐसी सजा दूंगा कि मरने के बाद भी स्वर्ग के हकदार न हो पाओ।

बताते है कि घटना के बाद ही अंग्रेंजो ने अजनाला के कुएं में बागियों को फेंक कर अपना बदला लिया। संयोग से जलियांवाला कांड में भी फायरिंग के दौरान सैकड़ो की तादाद में लोगों ने कुएं में कूदकर ही अपनी जान गंवाई थी।

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