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छत्रपति क्योंकि नहीं था लंकेश!

क्या‍ संयोग है कि कुछ दिन पहले जब गुरमीत सिंह राम रहीम को यौन शोषण के आरोप में जेल भेजा गया तो अचानक अखबारों ने याद दिलाया कि किस तरह उस पर उसके काले कारनामों का भंडाफोड़ करने वाले पत्रकार रामचंद्र छत्रपति की हत्या का भी मामला चल रहा है। वह सिरसा से एक अखबार ‘पूरा सच’ निकालता था। उसने ही सबसे पहले राम रहीम के काले कारनामों को उजागर करने वाली पीडित महिला की चिट्ठी छापी थी। बाबा के गुंडे उसे जान से मारने की धमकी दे रहे थे। उस पर जान लेवा हमला हुआ और वह ईलाज के लिए अपोलो अस्पताल में भर्ती कराया गया। 

वह जब भी होश में आता तो मजिस्ट्रेट के सामने अपने बयान दर्ज करवाने की बात कहता। मगर न तो पुलिस और प्रशासन ने उसकी सुनी और न ही उसके साथ हुई ज्यादती को किसी टीवी चैनल ने दिखाया और न ही किसी बड़े अखबार ने छापा। अब जब लंकेश पत्रिका पर हमला हुआ तो पत्रकारों की जो ऐतिहासिक एकजुटता देखने को मिली व न सिर्फ सराहनीय थी बल्कि उसने यह भी साबित कर दिया कि नाइंसाफी और हिंसा का शिकार बने पत्रकार का समर्थन करने के पहले देश की पत्रकार बिरादरी यह देखती है कि वह किस विचारधारा का था और किन लोगों के साथ जुड़ा हुआ था? उसकी हैसियत उसके लेखन और खुलासे से नहीं बल्कि उस जमात से आंकी जाती है जिससे वह जुड़ा होता है।

गौरी लंकेश नामक महिला पत्रकार की पिछले दिनों बेंगलूरु में गोली मारकर हत्या कर दी गई थी जो निहायत कायराना व निदंनीय कृत्य है। उनके पिता पी लंकेश कन्नड़ के जाने-माने कवि व पत्रकार थे। उन्होंने काफी पहले लंकेश पत्रिका शुरू की थी। इस पत्रिका की खासियत यह थी कि इसमें विज्ञापन नहीं छापे जाते थे और वह अपनी प्रसार संख्या के जरिए ही अपना खर्च निकालती थी। पी लंकेश गांधीवादी व समाजवादी का मिश्रण थे। उनके तीन बच्चे है। बेटी गौरी, बेटा इद्रजीत व दूसरी बेटी कविता। इंद्रजीत व कविता की कोई खास राजनीतिक विचारधारा नहीं रही जबकि गौरी को धुर वामपंथी, दलित समर्थक व नास्तिक माना जाता है। वह खासतौर से हिंदुत्व विरोधी थी। वैसे तो वह खुद को जाति व्यवस्था विरोधी होने का दावा करती थी मगर लिंगायत होने के कारण वह इस वर्ग की इस मांग का पूरी तरह से समर्थन करती थी कि लिंगायतो को हिंदू मानना गलत है वे तो इन लोगों से एकदम अलग है। 

गौरी ने बेंगलूरु के सेंट्रल कॉलेज से बीए किया व दिल्ली के इंडियन इंस्टीट्यूटन ऑफ मॉस कम्यूनिकेशन से पत्रकारिता में एमए किया। उसने टाइम्स ऑफ इंडिया के बेंगलूरू संस्करण से अपनी पत्रकारिता की शुरुआत की।  बाद में संडे व ईटीवी कन्नड के साथ जुड़ी व दिल्ली आ गई। बाबरी विध्वंस की रिपोर्टिंग के कारण वह दक्षिण में चर्चित हुई।

पी लंकेश अपनी बेधड़क पत्रकारिता के लिए जाने जाते थे। जब 2000 में उनका निधन हुआ तो उनके बच्चों ने इस पत्रिका का प्रकाशन जारी रखने में अपनी असमर्थता जता दी। मगर पी लंकेश के दोस्त व पत्रिका के प्रकाशक मणि ने उन लोगों को समझाया कि इतनी सफल व चर्चित पत्रिका का प्रकाशन बंद नहीं करना चाहिए। बेहतर होगा कि वे लोग कुछ समय तक इसे चलाने की कोशिश करे और अपने अनुभवों के आधार पर ही इसे बंद करने या इसका प्रकाशन जारी रखने का फैसला करें। गौरी पत्रिका की संपादक बन गई व उसका भाई इसका प्रबंध निदेशक बन गया।

बाद में उसका अपने भाई के साथ विवाद हो गया। यह विवाद नक्सली आतंकवादियों और पुलिस में हुई एक मुठभेड को लेकर हुआ। उसने उस रिपोर्ट में नक्सलियो का महिमा मंडित किया। उसके भाई का मानना था कि ऐसा करना गलत था। मगर वह नक्सलियो के प्रति काफी हमदर्दी जताने लगी थी व हिंदू धर्म व भाजपा के काफी खिलाफ होती जा रही थी। इस घटना के बाद 2005 में भाई, बहन अलग हो गए और गौरी ने अपनी अलग ‘गौरी लंकेश पत्रिका शुरू कर दी। उसका चिदानंद राजघट्टा के साथ विवाह हो गया व कुछ वर्षों के बाद दोनों अलग हो गए। इस समय राजघट्टा अमेरिका में रह रहे हैं व टाइम्स ऑफ इंडिया के लिए ब्लॉग लिखते है।

मूलतः गौरी लंकेश पत्रकारिता की उस पीढ़ी का प्रतिनिधित्व करती थी जो कि कन्हैया, इंसान के इंसान से प्रेम करने के घोर समर्थक माने जाते हैं। उसने तो जेएनयू कांड के बाद कन्हैया को अपना मानस पुत्र  घोषित कर दिया। 

जहां अभी उसके हत्याकांड की जांच जारी ही वहीं पत्रकारिता की वामपंथी जमात ने इसके लिए दक्षिणपंथी ताकतों को जिम्मेदार ठहराना शुरू कर दिया है। वहीं उसके भाई का शक है कि वह नक्सलियों का शिकार हुई है क्योंकि उसने कई नक्सलियों का आत्म समर्पण करवाया था। उसके इस बयान को दूसरी बहन कविता ने बेहूदा बता दिया है। 

अपना मानना है कि यह सीधे एक पत्रकार व उसके लेखन की स्वतंत्रता पर हमला है। मगर इसे विचारधारा के आधार पर रंग कर भगवा बनाम अन्य का मामला बना दिया गया है। हो सकता है कि इसके पीछे दक्षिणपंथी ताकतों का हाथ हो मगर महज इस आधार पर एक महिला पत्रकार की हत्या पर राजनीति करना उचित नहीं है। क्योंकि अगले साल कर्नाटक  में चुनाव हैं व लिंगयात वहां की राजनीति में बेहद अहमियत रखते है इसलिए इस मामले को राजनीतिक मोड़ दिया जा रहा है। 

भाजपा के मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार बीएस येद्दीयुरप्पा भी लिंगायत ही है। मौजूदा मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने विगत में लिंगायतो को भड़काने वाले अनेक कदम उठाए हैं। सारे राजनीतिक दल व उनके नेता इस विवाद में कुद पडे हैं। ऐसे में फिर मन यह विचार करने के लिए विवश हो जाता है कि आखिर पत्रकारों की इस जमात ने रामचंद्र छत्रपति की हत्या पर भी ऐसी एकजुटता क्यों नहीं जताई? मोमबत्तियां जलाकर धरना प्रदर्शन क्यों नहीं किए थे? किसी भी दल के नेता ने उसकी हत्या की निंदा करते हुए दोषियों को सजा देने की मांग क्यों नहीं की थी? क्या सिर्फ इसलिए क्योंकि दिल्ली के पत्रकारों का टोला उसकी विचारधारा से अनभिज्ञ था। वह एक हिंदी का पत्रकार था जिसका अंग्रेंजी के पत्रकारों व उनकी जमात से दूर-दूर तक कोई नाता नहीं था।

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